जयपाल सिंह मुंडा: वह शख्स जिसने संविधान सभा में कहा था— “हमें लोकतंत्र मत सिखाओ, हमने दुनिया को लोकतंत्र दिया है”

Marang Gomke Jaipal Singh Munda Death Anniversary Special Adivasi Law

“आज मारंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा की पुण्यतिथि है। इस महान अवसर पर हम उनके उस ऐतिहासिक ‘जयपाल सिंह मुंडा संविधान सभा भाषण’ को याद कर रहे हैं, जिसने भारतीय लोकतंत्र में आदिवासियों के अस्तित्व की नई परिभाषा लिखी

​आज का दिन भारतीय इतिहास और आदिवासी अस्मिता के लिए अत्यंत भावुक और गौरवशाली है। आज हम उस महामानव की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन करते हैं, जिन्होंने दबे-कुचले समाज की आवाज़ को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संविधान सभा में गूँजने पर मजबूर कर दिया। हम बात कर रहे हैं आदिवासियों के मसीहा और ‘मारंग गोमके’ जयपाल सिंह मुंडा की, जिनका जीवन संघर्ष और समर्पण की एक अद्वितीय मिसाल है।

​3 जनवरी 1903 को टकरा, राँची (अब झारखंड) में जन्मे जयपाल सिंह मुंडा केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक प्रखर वक्ता, अद्वितीय हॉकी खिलाड़ी और आदिवासियों के आत्मसम्मान के सबसे बड़े पैरोकार थे। आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर, उनके उस ऐतिहासिक व्यक्तित्व को याद करना अनिवार्य है जिसने संविधान निर्माण के समय आदिवासियों की पहचान को अक्षुण्ण रखने की लड़ाई लड़ी। ऑक्सफोर्ड से शिक्षित और 1928 ओलंपिक के स्वर्ण पदक विजेता कप्तान होने के बावजूद, उनका दिल हमेशा अपनी माटी और अपने लोगों के लिए धड़कता रहा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि आदिवासी इस देश के ‘मूल निवासी’ हैं और उनकी सहमति के बिना भारत का भाग्य नहीं लिखा जा सकता।

2. ऑक्सफोर्ड से आईसीएस (ICS) तक: एक अनोखा संघर्ष

​जयपाल सिंह मुंडा की मेधा का लोहा पूरी दुनिया ने माना था। 1910 से 1919 तक रांची के संत पॉल्स स्कूल में पढ़ने के बाद, वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए।

  • अद्भुत विद्वता: 1922 में उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से एमए किया।
  • आईसीएस का त्याग: जिस साल (1928) उन्होंने भारत को हॉकी में पहला स्वर्ण पदक दिलाया, उसी साल उन्होंने दुनिया की सबसे कठिन ‘आईसीएस’ परीक्षा भी पास की। लेकिन जब अंग्रेजों ने उन्हें ट्रेनिंग के लिए छुट्टी देने से मना किया, तो उन्होंने उस ‘शाही नौकरी’ को लात मार दी। उन्होंने चुना—अपने समाज का संघर्ष।

3. संविधान सभा में ऐतिहासिक दहाड़: “लोकतंत्र हमारी विरासत है”

​संविधान सभा में जब आदिवासियों को ‘पिछड़ा’ और ‘अल्पसंख्यक’ मानकर दया दिखाने की कोशिश की जा रही थी, तब जयपाल सिंह मुंडा ने अपनी दहाड़ से पूरी सभा को हिला दिया। उन्होंने पंडित नेहरू और डॉ. अंबेडकर के सामने स्पष्ट कहा:

“आप हमें लोकतंत्र क्या सिखाएंगे? आदिवासियों की रूढ़ी सभा पारंपरिक ग्राम सभा पंचायत और ‘ग्राम सभा’ दुनिया की सबसे पुरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था है। आपको तो हमसे लोकतंत्र सीखने की जरूरत है। हम इस देश के सबसे गणतांत्रिक समुदाय हैं।”

​उनके इस हस्तक्षेप का ही परिणाम था कि संविधान में 400 आदिवासी समूहों को ‘अनुसूचित जनजाति’ (ST) का दर्जा मिला। उन्होंने साफ किया कि आदिवासियों को ‘आरक्षण’ खैरात में नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक शोषण के हर्जाने के तौर पर मिलना चाहिए। आरक्षण और प्रतिनिधित्व पर विस्तार से यहाँ पढ़ें

4. अनुच्छेद 244 और 5वीं अनुसूची के रचयिता

​जयपाल सिंह मुंडा जानते थे कि आदिवासियों का भला केवल कागजी कानूनों से नहीं होगा। उन्होंने जोर दिया कि आदिवासियों का प्रशासन उनकी अपनी परंपराओं और ‘स्वशासन’ के आधार पर होना चाहिए।

PESA और ग्राम सभा: वे चाहते थे कि ग्राम सभा ही अपने संसाधनों की मालिक हो। इसी विजन को बाद में दिलीप सिंह भूरिया कमेटी ने कानूनी रूप दिया। पेसा एक्ट और भूरिया कमेटी का सच यहाँ जानें

संवैधानिक कवच: आज जो हम 5वीं और 6वीं अनुसूची, ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल (TAC) और आदिवासी मंत्रालय देखते हैं, वह जयपाल सिंह मुंडा की ही दूरदर्शिता है।

5. अलग ‘झारखंड’ का सपना और राजनीतिक उलगुलान

​1938-39 में उन्होंने ‘अखिल भारतीय आदिवासी महासभा’ का गठन किया। उनका विजन केवल एक राज्य नहीं, बल्कि एक ‘आदिवासी प्रदेश’ था जहाँ शोषण की कोई जगह न हो। उन्होंने ‘अबुआ दिशुम-अबुआ राज’ के सपने को राजनीतिक धरातल पर उतारा। हालांकि झारखंड 2000 में बना, लेकिन जयपाल सिंह मुंडा ने 1952 में ही ‘झारखंड पार्टी’ बनाकर आदिवासियों को एक राजनीतिक ताकत के रूप में खड़ा कर दिया था।

6. जल-जंगल-जमीन: प्रथम मालिक का अधिकार

​जयपाल सिंह मुंडा का मानना था कि आदिवासी और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं। 5 जनवरी 2011 का सुप्रीम कोर्ट फैसला भी उनके इसी विजन की पुष्टि करता है कि आदिवासी इस देश के ‘प्रथम मालिक’ हैं। उन्होंने वन अधिकार और सामुदायिक पट्टों की वकालत उस समय की थी जब कोई इसके बारे में सोच भी नहीं रहा था। वन अधिकार और ग्राम सभा की शक्तियां यहाँ पढ़ें

7. एक विस्मृत महानायक: क्या हमने न्याय किया?

​यह बेहद दुखद है कि जिस शख्स ने आईसीएस छोड़ा, ओलंपिक गोल्ड जीता और आदिवासियों के लिए संविधान में लड़ाई लड़ी, आज उन्हें ‘भारत रत्न’ तक नहीं दिया गया। वे जननायक टंट्या भील जैसे योद्धाओं की परंपरा के आधुनिक अगुआ थे। जननायक टंट्या भील की वीरता यहाँ पढ़ें। आज हमारी जिम्मेदारी है कि उनके विचारों को घर-घर पहुँचाएं।

जयपाल सिंह मुंडा के संघर्ष और योगदान के 10 मुख्य बिंदु:

1.​आज उनकी पुण्यतिथि पर, उनका संघर्ष हमें याद दिलाता है कि एकता ही आदिवासियों की सबसे बड़ी शक्ति है।

​2.जयपाल सिंह मुंडा संविधान सभा के एकमात्र ऐसे सदस्य थे जिन्होंने आदिवासियों के अधिकारों को पूरी प्रखरता से रखा।

3.​उन्होंने ‘आदिवासी’ शब्द के प्रयोग पर जोर दिया, ताकि हमारी प्राचीन और गौरवशाली पहचान बनी रहे।

​4.वे 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम के स्वर्ण पदक विजेता कप्तान थे।

5.​उन्होंने आदिवासियों के लिए अलग ‘झारखंड’ राज्य की परिकल्पना की और इसके लिए राजनीतिक संघर्ष छेड़ा।

6.​संविधान सभा में उन्होंने कहा था कि आदिवासियों को किसी से लोकतंत्र सीखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हमारा समाज सदियों से लोकतांत्रिक है।

7.​उन्होंने जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के प्राकृतिक और परंपरागत अधिकारों की वकालत की।

8.​वे ‘आदिवासी महासभा’ के अध्यक्ष रहे, जिसने आगे चलकर झारखंड आंदोलन को दिशा दी।

9.​उन्होंने स्पष्ट किया कि आदिवासियों का शोषण बंद होना चाहिए और उन्हें शासन-प्रशासन में उचित भागीदारी मिलनी चाहिए।

​10.जयपाल सिंह मुंडा ने शिक्षा के महत्व पर हमेशा जोर दिया ताकि युवा अपनी विरासत को बचा सकें।

निष्कर्ष: जानकार बनें, अधिकार पाएं

​जयपाल सिंह मुंडा की पुण्यतिथि पर हमारा सबसे बड़ा संकल्प यह होना चाहिए कि हम अपने संवैधानिक अधिकारों (अनुच्छेद 244) को पहचानें। उन्होंने कहा था कि आदिवासियों का शोषण बंद होना चाहिए, लेकिन आज भी जमीन के लिए हमें लड़ना पड़ रहा है। हमें फिर से उसी बुलंदी के साथ कहना होगा— “हमें लोकतंत्र मत सिखाओ, हम इस देश के मालिक हैं।”

जय जोहार! जय आदिवासी! मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा अमर रहें!