जयपाल सिंह मुंडा: वह शख्स जिसने संविधान सभा में कहा था— “हमें लोकतंत्र मत सिखाओ, हमने दुनिया को लोकतंत्र दिया है”

Marang Gomke Jaipal Singh Munda Death Anniversary Special Adivasi Law

“आज मारंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा की पुण्यतिथि है। इस महान अवसर पर हम उनके उस ऐतिहासिक ‘जयपाल सिंह मुंडा संविधान सभा भाषण’ को याद कर रहे हैं, जिसने भारतीय लोकतंत्र में आदिवासियों के अस्तित्व की नई परिभाषा लिखी

​आज का दिन भारतीय इतिहास और आदिवासी अस्मिता के लिए अत्यंत भावुक और गौरवशाली है। आज हम उस महामानव की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन करते हैं, जिन्होंने दबे-कुचले समाज की आवाज़ को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संविधान सभा में गूँजने पर मजबूर कर दिया। हम बात कर रहे हैं आदिवासियों के मसीहा और ‘मारंग गोमके’ जयपाल सिंह मुंडा की, जिनका जीवन संघर्ष और समर्पण की एक अद्वितीय मिसाल है।

​3 जनवरी 1903 को टकरा, राँची (अब झारखंड) में जन्मे जयपाल सिंह मुंडा केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक प्रखर वक्ता, अद्वितीय हॉकी खिलाड़ी और आदिवासियों के आत्मसम्मान के सबसे बड़े पैरोकार थे। आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर, उनके उस ऐतिहासिक व्यक्तित्व को याद करना अनिवार्य है जिसने संविधान निर्माण के समय आदिवासियों की पहचान को अक्षुण्ण रखने की लड़ाई लड़ी। ऑक्सफोर्ड से शिक्षित और 1928 ओलंपिक के स्वर्ण पदक विजेता कप्तान होने के बावजूद, उनका दिल हमेशा अपनी माटी और अपने लोगों के लिए धड़कता रहा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि आदिवासी इस देश के ‘मूल निवासी’ हैं और उनकी सहमति के बिना भारत का भाग्य नहीं लिखा जा सकता।

2. ऑक्सफोर्ड से आईसीएस (ICS) तक: एक अनोखा संघर्ष

​जयपाल सिंह मुंडा की मेधा का लोहा पूरी दुनिया ने माना था। 1910 से 1919 तक रांची के संत पॉल्स स्कूल में पढ़ने के बाद, वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए।

  • अद्भुत विद्वता: 1922 में उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से एमए किया।
  • आईसीएस का त्याग: जिस साल (1928) उन्होंने भारत को हॉकी में पहला स्वर्ण पदक दिलाया, उसी साल उन्होंने दुनिया की सबसे कठिन ‘आईसीएस’ परीक्षा भी पास की। लेकिन जब अंग्रेजों ने उन्हें ट्रेनिंग के लिए छुट्टी देने से मना किया, तो उन्होंने उस ‘शाही नौकरी’ को लात मार दी। उन्होंने चुना—अपने समाज का संघर्ष।

3. संविधान सभा में ऐतिहासिक दहाड़: “लोकतंत्र हमारी विरासत है”

​संविधान सभा में जब आदिवासियों को ‘पिछड़ा’ और ‘अल्पसंख्यक’ मानकर दया दिखाने की कोशिश की जा रही थी, तब जयपाल सिंह मुंडा ने अपनी दहाड़ से पूरी सभा को हिला दिया। उन्होंने पंडित नेहरू और डॉ. अंबेडकर के सामने स्पष्ट कहा:

“आप हमें लोकतंत्र क्या सिखाएंगे? आदिवासियों की रूढ़ी सभा पारंपरिक ग्राम सभा पंचायत और ‘ग्राम सभा’ दुनिया की सबसे पुरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था है। आपको तो हमसे लोकतंत्र सीखने की जरूरत है। हम इस देश के सबसे गणतांत्रिक समुदाय हैं।”

​उनके इस हस्तक्षेप का ही परिणाम था कि संविधान में 400 आदिवासी समूहों को ‘अनुसूचित जनजाति’ (ST) का दर्जा मिला। उन्होंने साफ किया कि आदिवासियों को ‘आरक्षण’ खैरात में नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक शोषण के हर्जाने के तौर पर मिलना चाहिए। आरक्षण और प्रतिनिधित्व पर विस्तार से यहाँ पढ़ें

4. अनुच्छेद 244 और 5वीं अनुसूची के रचयिता

​जयपाल सिंह मुंडा जानते थे कि आदिवासियों का भला केवल कागजी कानूनों से नहीं होगा। उन्होंने जोर दिया कि आदिवासियों का प्रशासन उनकी अपनी परंपराओं और ‘स्वशासन’ के आधार पर होना चाहिए।

PESA और ग्राम सभा: वे चाहते थे कि ग्राम सभा ही अपने संसाधनों की मालिक हो। इसी विजन को बाद में दिलीप सिंह भूरिया कमेटी ने कानूनी रूप दिया। पेसा एक्ट और भूरिया कमेटी का सच यहाँ जानें

संवैधानिक कवच: आज जो हम 5वीं और 6वीं अनुसूची, ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल (TAC) और आदिवासी मंत्रालय देखते हैं, वह जयपाल सिंह मुंडा की ही दूरदर्शिता है।

5. अलग ‘झारखंड’ का सपना और राजनीतिक उलगुलान

​1938-39 में उन्होंने ‘अखिल भारतीय आदिवासी महासभा’ का गठन किया। उनका विजन केवल एक राज्य नहीं, बल्कि एक ‘आदिवासी प्रदेश’ था जहाँ शोषण की कोई जगह न हो। उन्होंने ‘अबुआ दिशुम-अबुआ राज’ के सपने को राजनीतिक धरातल पर उतारा। हालांकि झारखंड 2000 में बना, लेकिन जयपाल सिंह मुंडा ने 1952 में ही ‘झारखंड पार्टी’ बनाकर आदिवासियों को एक राजनीतिक ताकत के रूप में खड़ा कर दिया था।

6. जल-जंगल-जमीन: प्रथम मालिक का अधिकार

​जयपाल सिंह मुंडा का मानना था कि आदिवासी और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं। 5 जनवरी 2011 का सुप्रीम कोर्ट फैसला भी उनके इसी विजन की पुष्टि करता है कि आदिवासी इस देश के ‘प्रथम मालिक’ हैं। उन्होंने वन अधिकार और सामुदायिक पट्टों की वकालत उस समय की थी जब कोई इसके बारे में सोच भी नहीं रहा था। वन अधिकार और ग्राम सभा की शक्तियां यहाँ पढ़ें

7. एक विस्मृत महानायक: क्या हमने न्याय किया?

​यह बेहद दुखद है कि जिस शख्स ने आईसीएस छोड़ा, ओलंपिक गोल्ड जीता और आदिवासियों के लिए संविधान में लड़ाई लड़ी, आज उन्हें ‘भारत रत्न’ तक नहीं दिया गया। वे जननायक टंट्या भील जैसे योद्धाओं की परंपरा के आधुनिक अगुआ थे। जननायक टंट्या भील की वीरता यहाँ पढ़ें। आज हमारी जिम्मेदारी है कि उनके विचारों को घर-घर पहुँचाएं।

जयपाल सिंह मुंडा के संघर्ष और योगदान के 10 मुख्य बिंदु:

1.​आज उनकी पुण्यतिथि पर, उनका संघर्ष हमें याद दिलाता है कि एकता ही आदिवासियों की सबसे बड़ी शक्ति है।

​2.जयपाल सिंह मुंडा संविधान सभा के एकमात्र ऐसे सदस्य थे जिन्होंने आदिवासियों के अधिकारों को पूरी प्रखरता से रखा।

3.​उन्होंने ‘आदिवासी’ शब्द के प्रयोग पर जोर दिया, ताकि हमारी प्राचीन और गौरवशाली पहचान बनी रहे।

​4.वे 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम के स्वर्ण पदक विजेता कप्तान थे।

5.​उन्होंने आदिवासियों के लिए अलग ‘झारखंड’ राज्य की परिकल्पना की और इसके लिए राजनीतिक संघर्ष छेड़ा।

6.​संविधान सभा में उन्होंने कहा था कि आदिवासियों को किसी से लोकतंत्र सीखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हमारा समाज सदियों से लोकतांत्रिक है।

7.​उन्होंने जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के प्राकृतिक और परंपरागत अधिकारों की वकालत की।

8.​वे ‘आदिवासी महासभा’ के अध्यक्ष रहे, जिसने आगे चलकर झारखंड आंदोलन को दिशा दी।

9.​उन्होंने स्पष्ट किया कि आदिवासियों का शोषण बंद होना चाहिए और उन्हें शासन-प्रशासन में उचित भागीदारी मिलनी चाहिए।

​10.जयपाल सिंह मुंडा ने शिक्षा के महत्व पर हमेशा जोर दिया ताकि युवा अपनी विरासत को बचा सकें।

निष्कर्ष: जानकार बनें, अधिकार पाएं

​जयपाल सिंह मुंडा की पुण्यतिथि पर हमारा सबसे बड़ा संकल्प यह होना चाहिए कि हम अपने संवैधानिक अधिकारों (अनुच्छेद 244) को पहचानें। उन्होंने कहा था कि आदिवासियों का शोषण बंद होना चाहिए, लेकिन आज भी जमीन के लिए हमें लड़ना पड़ रहा है। हमें फिर से उसी बुलंदी के साथ कहना होगा— “हमें लोकतंत्र मत सिखाओ, हम इस देश के मालिक हैं।”

जय जोहार! जय आदिवासी! मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा अमर रहें!

भगवान बिरसा मुंडा: उलगुलान के महानायक, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी

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उलगुलान जिन्दाबाद साथियों,

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल शब्द नहीं, बल्कि एक चेतना हैं। उन्हीं में से एक हैं ‘धरती आबा’ (धरती के पिता)—भगवान बिरसा मुंडा। वे एक महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, धार्मिक सुधारक और आदिवासी प्रतीक थे, जिन्होंने अपनी वीरता और रणनीतिक कुशलता से तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिला दी थीं। आज का यह लेख उनके उस महान संघर्ष, बलिदान और आधुनिक गौरव को समर्पित है।

1. धरती आबा का दिव्य अवतरण और प्रारंभिक जीवन

​15 नवंबर 1875 को छोटानागपुर के उलिहातू गाँव में जन्मे बिरसा मुंडा का जीवन ही संघर्ष की एक जीवंत गाथा है। उनके पिता सुगना मुंडा और माता करमी हातू ने उन्हें कठिन परिस्थितियों में पाला। मिशनरी स्कूल के दौरान उन्होंने अनुभव किया कि कैसे विदेशी संस्कृति आदिवासी समाज के गौरव को नष्ट कर रही है। उन्होंने अपनी संस्कृति, जल-जंगल-ज़मीन और रूढ़ि प्रथाओं की रक्षा के लिए आजीवन संघर्ष करने का संकल्प लिया।

2. “अबुआ राज एते जाना, महारानी राज टुंडु जाना”: क्रांति का शंखनाद

​बिरसा मुंडा का सबसे प्रभावशाली नारा था— “अबुआ राज एते जाना, महारानी राज टुंडु जाना”। मुंडारी भाषा में इस ओजस्वी नारे का अर्थ था— “हमारा राज आएगा, महारानी (ब्रिटिश) का राज जाएगा।” यह नारा महज शब्द नहीं थे, यह आदिवासी स्वायत्तता का उद्घोष था। उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि यह देश हमारा है, और यहाँ का शासन भी हमारा ही होना चाहिए। यह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सीधे तौर पर एक खुली चुनौती थी।

3. उलगुलान: शोषण के विरुद्ध एक महासंग्राम

​बिरसा मुंडा का ‘उलगुलान’ (महान विद्रोह) आदिवासी इतिहास की सबसे बड़ी घटना है। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा लागू की गई जमींदारी प्रथा और सूदखोर महाजनों (दिकू) के खिलाफ जंग का ऐलान किया। उनका उद्देश्य केवल विदेशी शासन को हटाना ही नहीं था, बल्कि आदिवासियों की अस्मिता और उनकी पारंपरिक ग्राम सभाओं को पुनः स्थापित करना था।

4. गोरिल्ला युद्ध: अंग्रेजों के लिए अजेय योद्धा

​बिरसा मुंडा की सैन्य रणनीति अद्भुत थी। उनके पास अंग्रेजों जैसे आधुनिक हथियार नहीं थे, लेकिन उनके पास था ‘जंगल का ज्ञान’ और ‘गोरिल्ला युद्ध पद्धति’। उन्होंने घने जंगलों का लाभ उठाते हुए ब्रिटिश सेना को बार-बार चकमा दिया। उन्होंने दिखा दिया था कि साहस और रणनीति के आगे बड़ी से बड़ी सैन्य ताकत भी नतमस्तक हो सकती है।

5. CNT/SPT एक्ट: बलिदान का स्वर्णिम फल

​बिरसा मुंडा के बलिदान ने अंग्रेजी हुकूमत को सोचने पर मजबूर कर दिया कि आदिवासियों के बिना भारत पर शासन करना कठिन है। उनके बलिदान का ही फल था कि सरकार को छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT Act) लागू करने पड़े। ये कानून आज भी आदिवासियों की जमीन की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा कानूनी कवच हैं।

6. भारतीय संसद का सम्मान: केंद्रीय कक्ष में गौरव गाथा

​भगवान बिरसा मुंडा का सम्मान आज पूरे राष्ट्र में है। यह उनके महान बलिदान का ही परिणाम है कि वे एकमात्र ऐसे आदिवासी क्रांतिकारी हैं, जिनकी तस्वीर भारतीय संसद के केंद्रीय कक्ष की शोभा बढ़ा रही है। यह सम्मान न केवल बिरसा मुंडा का है, बल्कि उन करोड़ों आदिवासियों का है जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

7. जनजातीय गौरव दिवस और सरकारी सम्मान

​15 नवंबर को अब पूरा भारत ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाता है। यह दिन उनकी जयंती का उत्सव तो है ही, साथ ही हमारे सामाजिक संगठनों के लिए उनके विचारों को घर-घर पहुँचाने का एक माध्यम भी है।

8. भगवान बिरसा मुंडा का आधुनिक गौरव: स्मारक और फिल्में

​भगवान बिरसा मुंडा का नाम आज हर भारतीय की जुबान पर है:

  • बिरसा मुंडा अंतर्राष्ट्रीय विमानक्षेत्र: राँची में स्थित यह हवाई अड्डा उनके प्रति राष्ट्र का सर्वोच्च सम्मान है।
  • बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार: राँची की वह जेल जहाँ उन्होंने अपने प्राण त्यागे, उसे अब स्मारक के रूप में विकसित किया गया है।
  • सिनेमा: उनकी वीरता को पर्दे पर उतारने के लिए उन पर कई फिल्में बनाई गई हैं और नई फिल्में भी आने वाली हैं, जो नई पीढ़ी को ‘धरती आबा’ के संघर्ष से रूबरू कराएंगी।

महत्वपूर्ण 10 बिंदु: बिरसा मुंडा का संघर्ष और आज की सच्चाई

​बिरसा मुंडा ने जिस ‘उलगुलान’ का बिगुल फूँका था, वह आज भी प्रासंगिक है। हमारे महापुरुषों का बलिदान हमें याद दिलाता है कि कानून तो बने हैं, लेकिन उन पर अमल की लड़ाई अभी भी बाकी है:

  1. जमींदारी प्रथा का अंत: बिरसा ने अंग्रेजों द्वारा थोपी गई दमनकारी जमींदारी व्यवस्था के खिलाफ सीधी जंग छेड़ी थी।
  2. दिकू (सूदखोर) से मुक्ति: महाजनों द्वारा कर्ज के जाल में फंसाकर जमीन छीनने की साजिश को उन्होंने विफल किया।
  3. पारंपरिक ग्राम सभा: बिरसा का सपना था कि गांव का शासन गांव के हाथ में हो, न कि बाहरी प्रशासकों के।
  4. जल, जंगल, जमीन: उन्होंने स्पष्ट किया कि इन संसाधनों पर पहला हक यहाँ के आदिवासियों का है, न कि कंपनियों या सरकार का।
  5. CNT/SPT एक्ट का निर्माण: उनके संघर्ष के दबाव में ही अंग्रेजी हुकूमत को ये कानून बनाने पड़े ताकि आदिवासी जमीन बिकने से बच सके।
  6. PESA एक्ट की शक्ति: आज ग्राम सभाओं को जो कानूनी ताकत मिली है, वह बिरसा के स्वशासन के सपने का ही विस्तार है।
  7. वन अधिकार कानून: वन पर रहने वाले आदिवासियों के हक को सुनिश्चित करने के लिए यह एक बड़ी कानूनी जीत है।
  8. आरक्षण का अधिकार: शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण हमारे प्रतिनिधित्व को सुरक्षित करने का एक संवैधानिक औजार है।
  9. आदिवासी अस्मिता: बिरसा ने केवल जमीन नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और रूढ़ि प्रथाओं को बचाने की अलख जगाई।
  10. कानून बनाम हकीकत: आज इतने सारे कानून होने के बावजूद ‘जल-जंगल-जमीन’ सुरक्षित क्यों नहीं है? यह सबसे बड़ा सवाल है।

क्या कानून होने के बाद भी हमारी जल-जंगल-जमीन सुरक्षित है?

​यह एक गहरा और कड़वा सच है। बिरसा मुंडा ने जिस ‘अबुआ राज’ का सपना देखा था, वह आज भी संघर्ष की मांग कर रहा है।

  • सरकारी हस्तक्षेप: आज भी विकास के नाम पर ‘ग्राम सभा’ की सहमति के बिना जल-जंगल-जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है।
  • कानून का कमजोर क्रियान्वयन: सीएनटी-एसपीटी एक्ट और पेसा कानून कागजों में तो मजबूत हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका उल्लंघन जारी है।
  • हमारी जिम्मेदारी: भगवान बिरसा मुंडा ने हमें हथियार उठाने की हिम्मत दी थी, लेकिन आज हमें ‘कानूनी और संवैधानिक हथियार’ उठाने की जरूरत है। हमें अपने अधिकारों के प्रति शिक्षित होना होगा, ताकि हम दिकू (बाहरी शोषणकर्ताओं) को ग्राम सभा के माध्यम से जवाब दे सकें।

निष्कर्ष: कानून तभी सुरक्षित रहेंगे जब हम ‘ग्राम सभा’ को इतना शक्तिशाली बनाएंगे कि कोई भी बाहरी शक्ति हमारी जमीन पर अवैध कब्जा न कर सके। उलगुलान अभी खत्म नहीं हुआ है, उलगुलान का स्वरूप बदल गया है!

अधिकारों की लड़ाई जारी रखें (Internal Links):

​हमारे अधिकारों के लिए और गहराई से समझने के लिए इन्हें ज़रूर पढ़ें:

उलगुलान जोहार जिन्दाबाद,

टंट्या मामा की ‘भील पलटन’: वो अजेय सेना जिसने हिला दी थी ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें!

Bhil Corps: The historical military force formed by the British in the early 19th century in Central India, reflecting Bhil tribal martial history.

लोग जिन्हें ‘अनपढ़’ और ‘जंगली’ कहकर मजाक उड़ाते थे, उन्हीं आदिवासियों ने जब अपनी माटी की रक्षा के लिए हथियार उठाए, तो दुनिया की सबसे आधुनिक सेना (अंग्रेज) के पसीने छूट गए। जननायक टंट्या मामा ने किसी सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि अपनी ‘पारंपरिक ग्राम सभाओं’ और ‘रूढ़िगत व्यवस्था’ के जरिए समाज को एकजुट किया और खड़ी की— “भील पलटन”

🏹 भील पलटन: हर गाँव, हर जिले में एक अभेद्य दीवार

​टंट्या मामा ने समाज को जोड़ने के लिए गाँवों की पारंपरिक चौपालों का सहारा लिया। उन्होंने अपनी रूढ़िगत ग्राम सभाओं के जरिए युवाओं को संदेश भेजा और देखते ही देखते हर राज्य और हर जिले में ‘भील पलटन’ की छोटी-छोटी टुकड़ियाँ तैयार हो गईं।

  • ​यह कोई किराए की फौज नहीं थी, यह अपनी माटी के लिए मरने वाले बेटों का जज्बा था।
  • ​इस पलटन का नेतृत्व स्वयं मामा करते थे और उनका एक इशारा पूरे जंगल में आग की तरह फैल जाता था।

🔥 गोरिल्ला युद्ध: अंग्रेजों के लिए ‘अदृश्य काल’

​अंग्रेजों के पास बंदूकें थीं, तोपें थीं और हजारों की फौज थी, लेकिन टंट्या मामा के पास ‘छापामार युद्ध’ (Gorilla Warfare) की वो अद्भुत रणनीति थी जिसका लोहा पूरी दुनिया ने माना।

  • अदृश्य हमला: भील पलटन हवा की तरह आती, बिजली की तरह हमला करती और घने जंगलों में गायब हो जाती। अंग्रेज सिपाही सिर्फ धूल झाड़ते रह जाते।
  • रणनीति: वे जानते थे कि सीधे युद्ध में जीतना मुश्किल है, इसलिए उन्होंने ‘रसद काटना’ और ‘संचार तंत्र’ को ठप करने की ऐसी कला सीखी कि अंग्रेज अफसरों ने अपनी डायरियों में उन्हें ‘Ghost of the Jungle’ (जंगल का भूत) तक कह डाला।

🛡️ हथियार क्यों उठाए? मजबूर व्यवस्था का जवाब

​टंट्या मामा खूंखार नहीं थे, वे तो स्वभाव से सरल और दयालु थे। लेकिन जब अंग्रेजी व्यवस्था और साहूकारों ने आदिवासियों को उनके ही ‘जल, जंगल और जमीन’ से बेदखल कर बेबस और लाचार बना दिया, तब मामा ने अपनी रक्षा के लिए धनुष उठाया।

  • ​यह हमला नहीं था, यह स्वाभिमान की रक्षा थी।
  • ​उन्होंने साबित किया कि जंगल में रहने वाले लोग भले ही किताबी ज्ञान न रखते हों, लेकिन युद्ध और संगठन की जो समझ उनके पास है, वह किसी मिलिट्री स्कूल में नहीं सिखाई जा सकती।

💰 खजाने का वो रोचक सच

​कहा जाता है कि टंट्या मामा की ‘भील पलटन’ ने अंग्रेजों और दलाल साहूकारों से जो खजाना छीना, उसे वे कभी अपने पास नहीं रखते थे।

  • मददगार हाथ: वे आधी रात को गरीबों की झोपड़ियों में अनाज और पैसे छोड़ आते थे।
  • रोचक तथ्य: मामा का खौफ ऐसा था कि अंग्रेज पुलिस अफसर भी उनके नाम से कांपते थे, लेकिन जनता के लिए वे ‘मामा’ थे, जिन पर लोग अपनी जान छिड़कते थे।

उलगुलान जिंदाबाद!

जय जोहार, जय आदिवासी!

जननायक टंट्या मामा का उलगुलान और 243-M की शक्ति!

Jannayak Tantya Mama: The legendary tribal revolutionary and freedom fighter who led the struggle against British colonial rule in Central India.

न्यूज़पेपर सुर्खी (1889): “लंदन का ‘द पॉल मॉल गजट’ कांप उठा था जब उसने भारत के इस ‘मसीहा’ की वीरता की कहानियाँ छापी थीं। गद्दारों ने डकैत कहा, पर दुनिया ने उन्हें ‘जननायक’ माना!”

महत्वाकांक्षी दलाल, साहूकार और ‘भील पलटन’ की ललकार

​जब इस देश के महत्वाकांक्षी दलाल, अंग्रेज हुकूमत और वे साहूकार (जो भारत में व्यापार करने आए थे और लुटेरे बन गए) मिलकर हमारे मजबूर, अनपढ़ और प्राकृतिक समुदाय (प्रकृति पूजक) को कुचल रहे थे, उनके अनाज और फसलों को कुचक्र रचकर लूट रहे थे, तब टंट्या मामा ने अपनी “भील पलटन” तैयार की।

​यह पलटन नहीं, मौत का वो साया था जो अत्याचारी अंग्रेजों और इन व्यापारी साहूकारों की रातों की नींद उड़ा देता था। मामा अपनी इस पलटन के साथ सरकारी खजानों और साहूकारों की तिजोरियों पर बिजली की तरह गिरते थे और लूटा हुआ एक-एक दाना वापस अपने उन लोगों तक पहुँचाते थे जिनसे वह छीना गया था।

क्या आप जानते हैं? टंट्या मामा की ख्याति इतनी थी कि उन्हें कई नामों से पूजा जाता है:

  • इंडियन रॉबिनहुड: अंग्रेजों द्वारा दी गई उपाधि (मसीहा)।
  • जननायक: जनता का असली नायक।
  • टंट्या मामा: प्यार और सम्मान से दिया गया नाम (आज भी लोग मामा के नाम की कसम खाते हैं)।
  • गर्वित आदिवासी मसीहा: प्राकृतिक अधिकारों का रक्षक।

जानिए अनुच्छेद 243-M की शक्ति

​टंट्या मामा जिस हक के लिए लड़े, वह आज संविधान के अनुच्छेद 243-M में सुरक्षित है। यही वह कानून है जो ‘सरकारी पंचायत’ को आपके रूढ़िगत क्षेत्रों में आने से रोकता है। टंट्या मामा का संघर्ष ही आज हमें यह कहने की ताकत देता है कि हमारी ‘पारंपरिक ग्राम सभा’ ही सर्वोपरि है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान: विनायक दामोदर का खुलासा

​इस संघर्ष की गूँज सात समंदर पार तक थी। जब विनायक दामोदर लंदन के ‘इंडिया हाउस’ में थे, तब उन्होंने वहाँ के पुस्तकालयों में टंट्या मामा के बारे में ब्रिटिश अखबारों (The Pall Mall Gazette) की रिपोर्ट्स पढ़ी थीं। उन्होंने दुनिया को बताया कि जिसे अंग्रेज ‘डाकू’ कह रहे हैं, वह दरअसल अपनी माटी का रक्षक और स्वराज का असली सेनानी है।

अदृश्य शक्ति और अंग्रेजों का ‘पातालपानी’ वाला खौफ

​अंग्रेज पुलिस का मानना था कि मामा के पास ‘अलौकिक शक्तियां’ हैं। उनकी ‘भील पलटन’ गोरिल्ला युद्ध में इतनी माहिर थी कि अंग्रेज अपनी भारी फौज के बावजूद उनके पैरों की धूल भी नहीं पकड़ पाए।

​अंत में, अपनों के धोखे से उन्हें गिरफ्तार किया गया। अंग्रेजों के दिल में भय इतना था कि 4 दिसंबर 1889 को फांसी देने के बाद, उनकी लाश तक उनके अपनों को नहीं दी गई। चुपके से पातालपानी के जंगलों में ले जाकर फेंक दिया गया, ताकि कहीं उनकी समाधि से फिर से क्रांति की आग न भड़क जाए।

क्रांति के तीन प्रमुख उलगुलान

  1. अजेय योद्धा और भील पलटन: जंगल का असली राजा कौन है, यह मामा ने अंग्रेजों को सिखा दिया। अंग्रेज पुलिस डायरियों में उन्हें ‘अदृश्य साया’ कहा गया।
  2. संवैधानिक संप्रभुता का बीज: टंट्या मामा का संघर्ष ही आज के अनुच्छेद 244(1) और PESA एक्ट की असली ताकत है।
  3. अमर विरासत: आज पातालपानी में हर ट्रेन रुककर टंट्या मामा को सलामी देती है। यह इस बात का प्रमाण है कि जननायक कभी मरते नहीं।

उलगुलान जिंदाबाद!

जय जोहार, जय आदिवासी!

ऐतिहासिक प्रमाण (Sources):

विदेशी रिकॉर्ड: ‘The Pall Mall Gazette’ (लंदन), 1889

साहित्यिक प्रमाण: विनायक दामोदर सावरकर की कृतियाँ

कानूनी दस्तावेज़: ‘The Scheduled Districts Act, 1874’ और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243-M