घटना कहां हुई?
आदिवासी जमीन अधिकार – इसी सवाल पर पूरा मामला खड़ा है जब रेंजर शंकर सिंह चौहान ने कहा – “यहीं तुम्हारी कब्र बना दूंगा”
मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के नरमलाय गांव (मांधाता विधानसभा क्षेत्र) में वन विभाग के रेंजर शंकर सिंह चौहान ने आदिवासी परिवारों से कहा – “यहीं तुम्हारी कब्र बना दूंगा, तुम्हारे गांव वाले देखते रह जाएंगे।”
यह सिर्फ एक गांव की घटना नहीं है। यह पूरे आदिवासी समाज के सम्मान और अधिकारों से जुड़ा सवाल है।
वीडियो सबूत
इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। वीडियो में रेंजर की बदतमीजी और गुंडागर्दी साफ दिख रही है। वीडियो देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें:
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सबसे बड़ा सवाल
क्या कोई सरकारी कर्मचारी लोगों को धमका सकता है?
क्या कोई रेंजर संविधान से ऊपर है?
क्या आदिवासियों को बिना कानूनी प्रक्रिया के जमीन से हटाया जा सकता है?
जवाब साफ है – नहीं।
रेंजर क्या होता है?
रेंजर वन विभाग का एक फील्ड स्तर का अधिकारी होता है। यह नीति बनाने वाला नहीं, बल्कि जमीन पर काम करने वाला कर्मचारी है।
पदक्रम को समझें:
- सबसे ऊपर – IFS अधिकारी
- फिर – कंजरवेटर / डिप्टी कंजरवेटर
- फिर – रेंजर (यहां है यह गुंडा)
- सबसे नीचे – फॉरेस्टर / गार्ड
रेंजर तहसीलदार से भी नीचे का पद है।
रेंजर की असली ड्यूटी क्या है?
- जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा करना
- अवैध कटाई रोकना
- जंगल की आग से बचाव करना
- वन प्रबंधन करना
किसी भी कानून में यह अधिकार नहीं दिया गया कि वह लोगों को धमकाए, बिना प्रक्रिया के घर हटाए, या अपमानजनक भाषा का उपयोग करे।
जनता के टैक्स से तनख्वाह लेते हो तो जनता का सम्मान करना तुम्हारा कर्तव्य है।
आदिवासी समाज कौन है?
आदिवासी समाज इस देश के मूल निवासी हैं। हमारे पुरखों ने आजादी के लिए अपनी जान दी।
बिरसा मुंडा, तांटिया भील, सिद्धू-कान्हू – हर आंदोलन में आदिवासियों का खून बहा है।
हम संविधान की इज्जत करते हैं, इसलिए शांति से रहते हैं। नहीं तो हथियार उठाना हमने आज भी नहीं छोड़ा है।
हमें मजबूर मत करो। बिरसा और तांटिया बनने में देर नहीं लगती।
यह देश संविधान और कानून से चलेगा
हम संविधान को मानने वाले लोग हैं। संविधान का कानून सब पर समान लागू होता है। चाहे वह रेंजर हो, चाहे कलेक्टर, चाहे आम आदमी।
अगर कोई अधिकारी गलत करता है, तो हम उसके खिलाफ कार्रवाई करवा सकते हैं। यह देश किसी एक की मनमानी से नहीं, संविधान और कानून से चलेगा।
ग्राम सभा का पहला अधिकार – खनिज पदार्थों पर
PESA Act 1996 और 5वीं अनुसूची के अनुसार ट्राइबल क्षेत्रों में ग्राम सभा का पहला और सबसे बड़ा अधिकार है कि वह तय करे कि खनिज पदार्थों का क्या होगा।
चूना पत्थर, लोहा, बॉक्साइट, कोयला, मैंगनीज, डोलोमाइट, ग्रेनाइट, बलुआ पत्थर, संगमरमर – इन सब पर ग्राम सभा का अधिकार है।
बिना ग्राम सभा की अनुमति:
- कोई खनन नहीं हो सकता
- कोई पट्टा नहीं दिया जा सकता
- कोई कंपनी काम नहीं कर सकती
आदिवासी क्षेत्रों की जमीन और उसके नीचे जो कुछ है, उसका असली मालिक ग्राम सभा है। कोई रेंजर नहीं, कोई कलेक्टर नहीं। यह कानून है।
कानून क्या कहता है? – विस्तार से समझें
1. Forest Rights Act, 2006 (FRA)
धारा 3(1): आदिवासियों को जमीन और जंगल पर रहने और उपयोग का अधिकार।
धारा 4(5): बिना अधिकारों की पहचान और प्रक्रिया पूरे किए किसी को बेदखल नहीं किया जा सकता।
यानी रेंजर साहब, नोटिस दिया था? सुनवाई की थी? कोई प्रक्रिया पूरी की थी? नहीं। तो फिर किस अधिकार से आए थे?
2. PESA Act, 1996
PESA Act 1996 सिर्फ 5वीं अनुसूची वाले ट्राइबल क्षेत्रों पर लागू होता है।
यह कानून कहता है:
- ग्राम सभा सर्वोच्च संस्था है
- जमीन, जंगल, पानी और खनिज संसाधनों पर फैसला ग्राम सभा का
- बिना ग्राम सभा की अनुमति कोई कार्य नहीं
खंडवा का नरमलाय गांव 5वीं अनुसूची क्षेत्र में आता है। इसलिए यहां PESA Act पूरी तरह लागू है।
3. CNT और SPT Act
यह कानून झारखंड, बिहार, ओडिशा और मध्य प्रदेश के कुछ आदिवासी इलाकों में लागू है।
यह आदिवासियों की जमीन को बाहरी लोगों से बचाता है। बिना ग्राम सभा और जिला स्तरीय अनुमति के जमीन न बेची जा सकती है, न छीनी जा सकती है।
4. 5वीं अनुसूची (अनुच्छेद 244)
5वीं अनुसूची संविधान का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यह आदिवासी क्षेत्रों को विशेष संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करती है:
- आदिवासियों की जमीन की रक्षा
- बाहरी हस्तक्षेप पर रोक
- स्थानीय स्वशासन को प्राथमिकता
5. IPC 506 / BNS 351 (आपराधिक धमकी)
जब रेंजर ने कहा “यहीं तुम्हारी कब्र बना दूंगा” तो यह सीधा आपराधिक धमकी का मामला है।
IPC 506 या BNS 351 के तहत यह अपराध है। सजा – 7 साल तक की जेल और जुर्माना।
यह कानून रेंजर पर भी उतना ही लागू होता है जितना किसी आम आदमी पर।
मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 14, 19, 21, 32)
अनुच्छेद 14: कानून के सामने सब बराबर हैं। चाहे वह रेंजर हो, चाहे कलेक्टर, चाहे आम आदमी। एक ही कानून सब पर लागू होता है।
अनुच्छेद 19: बोलने, एकत्र होने और विरोध करने की आजादी। आप धमकी के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं।
अनुच्छेद 21: जीने का अधिकार। “यहीं तुम्हारी कब्र बना दूंगा” कहना इसी अनुच्छेद का उल्लंघन है।
अनुच्छेद 32: सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार। यह संविधान का सबसे ताकतवर हथियार है। अगर कोई अधिकारी आपके मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो आप सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले
समता केस (Samatha vs State of Andhra Pradesh, 1997)
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में साफ कहा कि 5वीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में गैर-आदिवासियों को खनन पट्टा नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि इन क्षेत्रों में आदिवासियों की जमीन और संसाधनों की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है।
नियामगिरी केस (2013)
यह सबसे बड़ा और ऐतिहासिक फैसला है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा – “ग्राम सभा का फैसला अंतिम होगा।”
ओडिशा के डोंगरिया कोंध आदिवासियों की ग्राम सभा ने खनन के खिलाफ फैसला लिया और सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को मान लिया।
यानी ग्राम सभा के आगे सुप्रीम कोर्ट ने सिर झुकाया।
तो रेंजर साहब, आप ग्राम सभा को नजरअंदाज कर रहे हैं, यानी आप सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नजरअंदाज कर रहे हैं।
रेंजर साहब, आपका राजपत्र कहां है?
यह सबसे अहम सवाल है। बिना राजपत्र के ट्राइबल एरिया में काम करना कानून का उल्लंघन है।
दिखाइए अपना राजपत्र। बताइए कब से आप 5वीं अनुसूची क्षेत्र में बैठे हैं। किस अधिकार से आप आदिवासियों की जमीन छीन रहे हैं और उन्हें धमका रहे हैं?
अगर राजपत्र नहीं दिखाया तो समझ लीजिए कि आप खुद अतिक्रमणकारी हैं।
मदद के लिए संस्थाएं
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) – यह एक संवैधानिक निकाय है जो अनुच्छेद 338A के तहत बना है। वेबसाइट: https://ncst.nic.in/
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (NHRC) – मानव अधिकारों के उल्लंघन की शिकायतों की जांच करता है। वेबसाइट: https://nhrc.nic.in/ और टोल फ्री नंबर 14443 है।
सुप्रीम कोर्ट – अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं। वेबसाइट: https://www.sci.gov.in/
हाई कोर्ट – अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट जा सकते हैं।
PIL (जनहित याचिका) – अगर बड़े पैमाने पर आदिवासी अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, तो कोई भी जागरूक नागरिक PIL दायर कर सकता है।
महत्वपूर्ण बिंदु
1. रेंजर एक फील्ड अधिकारी है, सर्वोच्च प्राधिकरण नहीं। उसकी ड्यूटी जंगल बचाना है, आदिवासियों को धमकाना नहीं।
2. बिना कानूनी प्रक्रिया के किसी को बेदखल नहीं किया जा सकता। यह FRA की धारा 4(5) का सीधा उल्लंघन है।
3. ग्राम सभा ट्राइबल क्षेत्रों में सर्वोच्च संस्था है। PESA Act 1996 के अनुसार ग्राम सभा के फैसले को कोई नहीं बदल सकता।
4. ग्राम सभा का पहला अधिकार खनिज पदार्थों पर है। चूना पत्थर, लोहा, बॉक्साइट, कोयला, मैंगनीज, डोलोमाइट, ग्रेनाइट, बलुआ पत्थर, संगमरमर – सब पर ग्राम सभा का अधिकार है।
5. धमकी देना कानूनन अपराध है। IPC 506 / BNS 351 के तहत 7 साल जेल हो सकती है। रेंजर इससे ऊपर नहीं है।
6. बिना राजपत्र के ट्राइबल एरिया में काम करना अवैध है। हर अधिकारी को अपना राजपत्र दिखाना होगा।
7. NCST और NHRC शिकायत निवारण की संवैधानिक संस्थाएं हैं। इनका इस्तेमाल करें।
8. कानून और न्यायालय आदिवासी अधिकारों की रक्षा करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में यह साफ किया है।
9. संविधान का कानून सब पर समान रूप से लागू होता है। चाहे वह रेंजर हो, चाहे कलेक्टर, चाहे आम आदमी।
10. अगर कोई अधिकारी गलत करता है, तो उसके खिलाफ FIR करवा सकते हैं। नौकरी कोई ढाल नहीं है।
11. जानकारी और एकजुटता सबसे बड़ी ताकत है। अब समय डरने का नहीं, सवाल पूछने का है।
12. हम संविधान को मानने वाले लोग हैं। लेकिन हमें मजबूर मत करो। बिरसा और तांटिया बनने में देर नहीं लगती।
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सवाल – क्या रेंजर जमीन छीन सकता है?
जवाब – नहीं, बिल्कुल नहीं। बिना कानूनी प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकरण के वह कुछ नहीं कर सकता। FRA की धारा 4(5) साफ कहती है कि बिना प्रक्रिया के बेदखली नहीं हो सकती।
सवाल – अगर कोई रेंजर धमकी दे तो क्या करें?
जवाब – तुरंत पुलिस में IPC 506 के तहत FIR दर्ज कराएं। सबूत के तौर पर वीडियो और फोटो रखें। साथ ही जिला कलेक्टर, NCST और NHRC में शिकायत करें।
सवाल – ग्राम सभा इतनी ताकतवर क्यों है?
जवाब – PESA Act 1996 और 5वीं अनुसूची के अनुसार ट्राइबल क्षेत्रों में ग्राम सभा सर्वोच्च संस्था है। सुप्रीम कोर्ट ने भी नियामगिरी केस में ग्राम सभा के फैसले को अंतिम माना है।
सवाल – खनिज पदार्थों पर किसका अधिकार है?
जवाब – ट्राइबल क्षेत्रों में खनिज पदार्थों पर ग्राम सभा का अधिकार है। बिना ग्राम सभा की अनुमति कोई खनन नहीं हो सकता, कोई पट्टा नहीं दिया जा सकता।
सवाल – क्या मैं रेंजर के खिलाफ FIR करवा सकता हूं?
जवाब – हां, बिल्कुल। अगर वह धमकी देता है, गाली देता है, मारता है, या अवैध रूप से जमीन छीनने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ FIR दर्ज करवा सकते हैं।
सवाल – NCST में शिकायत कैसे करें?
जवाब – ncst.nic.in पर जाएं। वहां ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने का विकल्प है।
सवाल – NHRC कब जाना चाहिए?
जवाब – जब आपके जीवन, स्वतंत्रता, समानता या गरिमा के अधिकारों का उल्लंघन हो। धमकी देना, मारना, गाली देना – ये सब मानवाधिकार उल्लंघन है।
सवाल – क्या नौकरी वाले संविधान से ऊपर हैं?
जवाब – नहीं। नौकरी वाले भी संविधान और कानून के दायरे में हैं। कोई भी कानून से ऊपर नहीं है।
AdivasiLaw.in टीम का उद्देश्य
हमारी वेबसाइट adivasilaw.in का एक ही उद्देश्य है – आदिवासी समाज को उनके संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की सही और सटीक जानकारी देना।
हम PESA Act, Forest Rights Act, 5वीं अनुसूची, CNT/SPT Act, खनिज अधिकार, ग्राम सभा के अधिकार – सब कुछ आसान भाषा में समझाते हैं।
हमारा मानना है कि जागरूक आदिवासी समाज ही सशक्त आदिवासी समाज है।
आंतरिक लिंक
👉 https://adivasilaw.in/abkari-adhiniyam-pesa-act-gram-sabha/
👉 https://adivasilaw.in/ken-betwa-adivasi-visthapan/
बाहरी लिंक
👉 https://ncst.nic.in/
👉 https://nhrc.nic.in/
👉 https://www.sci.gov.in/
निष्कर्ष
रेंजर शंकर सिंह चौहान और उसकी तरह के सभी अधिकारियों के लिए एक ही संदेश:
तुमने जिस समाज को धमकाया है, वह इस देश का मूल मालिक है। हमारे पुरखों ने आजादी के लिए अपनी जान दी।
तुमने जिस ग्राम सभा को नजरअंदाज किया, वह सुप्रीम कोर्ट से भी ऊपर है। सुप्रीम कोर्ट ने ग्राम सभा के फैसले को अंतिम माना है।
तुम जनता के टैक्स से तनख्वाह लेते हो, इसलिए तुम जनता के सेवक हो, मालिक नहीं।
हम संविधान को मानने वाले लोग हैं। इसलिए हम शांति से अपनी बात रख रहे हैं। लेकिन हमें मजबूर मत करो।
बिरसा और तांटिया बनने में देर नहीं लगती।
अब समय बदल चुका है। अब डरने का नहीं, सवाल पूछने का समय है।
हमारे पास सबूत है, वीडियो है, कानून है, NCST है, NHRC है, सुप्रीम कोर्ट है।
हम जागरूक हैं, हम संगठित हैं, हम अपने अधिकार जानते हैं।
जय जोहार!
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जितना ज्यादा शेयर होगा, उतनी जल्दी इस सरकारी कर्मचारी की बर्दी उतरेगी।
और याद रखना – ग्राम सभा सर्वोच्च है। खनिज पदार्थों से लेकर जमीन, जंगल और पानी तक, हर चीज पर ग्राम सभा का अधिकार है। कोई रेंजर नहीं,
जय जोहार!