प्रस्तावना: 8% मूल मालिकों के अस्तित्व पर प्रहार ‘पांचवीं और छठी अनुसूची’
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 5 जनवरी 2011 को अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया था कि इस देश के 8% आदिवासी ही यहाँ के वास्तविक स्वामी (Original Inhabitants) हैं। लेकिन विडंबना देखिए, जो इस देश के असली मालिक हैं, आज उन्हें ही अपनी जल-जंगल-ज़मीन और संवैधानिक स्वायत्तता बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। आधुनिक लोकतंत्र के नाम पर ‘फूट डालो और राज करो’ की वही पुरानी औपनिवेशिक नीति अपनाई जा रही है। राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए आदिवासियों की सदियों पुरानी ‘आरी-चली’ (रूढ़ि प्रथा) को दरकिनार कर संवैधानिक प्रावधानों का गला घोंटा जा रहा है।
विशेष लिंक: 5 जनवरी 2011 का ऐतिहासिक फैसला: हम हैं असली मालिक
👉 📚 पूरा आर्टिकल एक नजर में
- 1 1. रूढ़ि प्रथा (आरी-चली): आदिवासियों का नैसर्गिक संविधान
- 2 2. अनुच्छेद 243-M: वो ‘लक्ष्मण रेखा’ जिसे जानबूझकर लांघा गया
- 3 3. पांचवीं और छठी अनुसूची: संवैधानिक स्वायत्तता का विस्तृत विवरण
- 4 4. राजनीतिक महत्वाकांक्षी लोगों का षड्यंत्र और ‘फूट डालो’ नीति
- 5 5. PESA कानून: सुरक्षा कवच या संसाधनों की लूट का रास्ता?
- 6 6. राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार: 91 और 92 वर्जित क्षेत्र
1. रूढ़ि प्रथा (आरी-चली): आदिवासियों का नैसर्गिक संविधान
आदिवासी समाज की ‘आरी-चली’ या रूढ़ि प्रथा केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह एक पूर्ण न्यायिक, प्रशासनिक और विधायी व्यवस्था है। यह व्यवस्था उस समय से अस्तित्व में है जब दुनिया के अधिकांश देशों के पास अपना लिखित संविधान तक नहीं था।
अनुच्छेद 13(3)(क) की शक्ति: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 13(3)(क) स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है कि ‘कानून’ के अंतर्गत ‘रूढ़ि’ (Custom) और ‘प्रथा’ (Usage) भी शामिल हैं। इसका अर्थ यह है कि आदिवासियों की पारंपरिक व्यवस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है।
न्यायिक व्याख्या: यदि कोई भी सरकारी आदेश या नया कानून आदिवासियों की इन रूढ़ियों का उल्लंघन करता है, तो वह अनुच्छेद 13 के तहत शून्य (Void) माना जाना चाहिए। लेकिन राजनीतिक चालाकी के तहत इस सत्य को समाज से छिपाकर रखा गया है।
2. अनुच्छेद 243-M: वो ‘लक्ष्मण रेखा’ जिसे जानबूझकर लांघा गया
संविधान का भाग 9 (पंचायती राज) अनुच्छेद 243-M के माध्यम से एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है। यह अनुच्छेद स्पष्ट रूप से कहता है कि पांचवीं और छठी अनुसूची के क्षेत्रों में सामान्य पंचायती राज व्यवस्था लागू नहीं होगी।
वर्जित क्षेत्र (Excluded Areas): ब्रिटिश काल से ही इन क्षेत्रों को ‘वर्जित’ या ‘आंशिक वर्जित’ क्षेत्रों (91, 92 वर्जित क्षेत्र) के रूप में रखा गया था ताकि आदिवासियों की विशिष्ट पहचान बची रहे।
षड्यंत्र की पटकथा: राजनीतिक दलों ने आदिवासियों को ‘अनपढ़’ और ‘अज्ञानी’ बनाए रखा ताकि वे यह न समझ सकें कि अनुच्छेद 243-M के तहत उनके क्षेत्रों में सामान्य चुनाव थोपना असंवैधानिक है। चुनाव के नाम पर समाज में ‘पार्टी’ और ‘गुट’ पैदा किए गए ताकि पारंपरिक ग्राम सभा की सामूहिक शक्ति को खंडित किया जा सके।
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3. पांचवीं और छठी अनुसूची: संवैधानिक स्वायत्तता का विस्तृत विवरण
संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची केवल प्रशासनिक नियम नहीं हैं, बल्कि ये ‘संविधान के भीतर एक छोटा संविधान’ हैं।
पांचवीं अनुसूची: यह राज्यपाल को विशेष शक्तियाँ देती है कि वह किसी भी केंद्रीय या राज्य कानून को आदिवासी हितों के खिलाफ होने पर रोक सके। लेकिन राज्यपालों की इस ‘विवेकाधीन शक्ति’ का उपयोग राजनीतिक हितों के लिए दबा दिया गया।
छठी अनुसूची: यह स्वायत्त जिला परिषदों (ADC) के माध्यम से विधायी और न्यायिक शक्तियाँ प्रदान करती है।
यूट्यूब विस्तृत व्याख्या: इन अनुसूचियों की जटिल कानूनी बारीकियों और वर्जित क्षेत्रों की मर्यादा को समझने के लिए यह वीडियो गाइड अत्यंत महत्वपूर्ण है:
👉 विस्तृत वीडियो: पांचवीं और छठी अनुसूची का संवैधानिक सच
4. राजनीतिक महत्वाकांक्षी लोगों का षड्यंत्र और ‘फूट डालो’ नीति
आदिवासी क्षेत्रों में आज जो चुनाव की गहमागहमी दिखती है, वह असल में ‘राजनीतिक घुसपैठ’ का एक माध्यम है।
चालाकी भरी नीति: षड्यंत्रकारी जानते हैं कि जब तक आदिवासी अपनी पारंपरिक ग्राम सभा (जैसे मांझी-परगना या मुंडा-मानकी व्यवस्था) से जुड़ा है, उसे हिलाना नामुमकिन है। इसलिए, ‘विकास’ का लालच देकर सरकारी पंचायतों को थोपा गया।
फूट डालो और राज करो: चुनाव के जरिए भाई को भाई के खिलाफ खड़ा किया गया। आज आदिवासी समाज अपने अधिकारों के लिए लड़ने के बजाय ‘प्रधान’ और ‘वार्ड सदस्य’ बनने की दौड़ में लगा है। यह वही ‘राजनीतिक महत्वाकांक्षा’ है जिसने समाज की सांस्कृतिक जड़ों में मट्ठा डाल दिया है।
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5. PESA कानून: सुरक्षा कवच या संसाधनों की लूट का रास्ता?
PESA (पंचायत विस्तार अधिनियम) 1996 का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक ग्राम सभा को कानूनी मान्यता देना था। लेकिन व्यवहार में, इसका उपयोग आदिवासियों की ज़मीन पर ‘वैध’ तरीके से कब्जा करने के लिए किया गया।
षड्यंत्र का उपयोग: ग्राम सभा की सहमति के बिना संसाधनों का दोहन नहीं किया जा सकता, इसलिए राजनीतिक तंत्र ने ‘ग्राम सभा’ को ही अपनी उंगलियों पर नचाना शुरू कर दिया। दिलीप भूरिया कमेटी की मूल भावना को बदलकर इसे केवल एक चुनावी प्रक्रिया तक सीमित कर दिया गया।
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6. राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार: 91 और 92 वर्जित क्षेत्र
इतिहास गवाह है कि आदिवासियों को ‘असभ्य’ कहकर उनके क्षेत्रों में घुसने की कोशिश की गई। सच्चाई यह है कि आदिवासी समाज सबसे सभ्य था क्योंकि उनके पास अपनी न्याय प्रणाली थी। आज इन वर्जित क्षेत्रों में राजनीतिक दल कानून का उपयोग करके आदिवासियों को ‘लाभार्थी’ (Beneficiary) बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि समाज सिर्फ योजनाओं का लाभ लेने वाला एक हिस्सा बनकर रह जाए और अपनी ‘मालिक’ वाली पहचान भूल जाए।
7. 10 मुख्य बिंदु: जो हर आदिवासी को याद होने चाहिए
अनुच्छेद 13(3)(क): हमारी रूढ़ि ही हमारा कानून है।
अनुच्छेद 243-M: हमारे क्षेत्रों में सामान्य पंचायत चुनाव वर्जित हैं।
8% मालिक: हम भारत के असली मालिक हैं, किराएदार नहीं।
पारंपरिक व्यवस्था: माझी-परगना और मुंडा-मानकी व्यवस्था ही हमारी असली संसद है।
राज्यपाल की शक्ति: राज्यपाल पांचवीं अनुसूची में हमारे संरक्षक हैं, उन्हें सक्रिय करना होगा।
PESA की स्वायत्तता: ग्राम सभा सर्वोच्च है, इसे किसी सरकार की अनुमति की जरूरत नहीं।
चालाकी पहचानें: चुनाव आपको बांटने के लिए है, ग्राम सभा जोड़ने के लिए।
शिक्षा का महत्व: संवैधानिक अधिकारों को पढ़ना ही असली उलगुलान है।
संसाधनों पर अधिकार: ज़मीन के नीचे के खनिज पर ग्राम सभा की पूर्व-सहमति अनिवार्य है।
एकता: राजनीतिक पार्टियों के झंडों के नीचे नहीं, बल्कि समाज के पारंपरिक झंडे के नीचे एकजुट होना होगा।
निष्कर्ष: अस्तित्व बचाने का आखिरी उलगुलान
यह केवल एक लेख नहीं, बल्कि हर उस आदिवासी युवा के लिए एक पुकार है जो महसूस करता है कि उसके समाज के साथ अन्याय हो रहा है। राजनीतिक षड्यंत्र बहुत गहरा है—वे आपको अनपढ़ रखकर, आपस में लड़ाकर आपकी पहचान मिटाना चाहते हैं। लेकिन याद रखिए, 5 जनवरी 2011 का फैसला आज भी हमारे पक्ष में खड़ा है। यदि हम ‘मालिक’ हैं, तो हमें मालिक की तरह व्यवहार करना होगा। हमें अपनी ‘आरी-चली’ को फिर से जीवित करना
होगा और संवैधानिक घुसपैठ को रोकना होगा।