आदिवासी धर्म कोड: जनगणना 2026 में क्या मिलेगा आदिवासियों को हक़ ?

“आदिवासी धर्म कोड (Adivasi Dharma Code) की मांग आज पूरे देश में मुखर है। जनगणना 2026 में आदिवासी समाज अपनी स्वतंत्र पहचान को लेकर एक ऐतिहासिक संघर्ष कर रहा है।”

मेरे आदिवासी भाइयों और बहनों, वक्त आ गया है कि हम अपनी चुप्पी तोड़ें! आपको यह जानकर हैरानी होगी कि आदिवासियों के पास अंग्रेजों के समय से ही अलग धर्म कोड का अधिकार था। 1871 से लेकर 1951 तक की जनगणना में आदिवासियों को ‘एनिमिस्ट’ (प्रकृति पूजक), ‘ट्राइबल रिलिजन’ या ‘एबोरिजिनल’ के रूप में अलग से गिना जाता था। लेकिन 1951 के बाद इस कॉलम को साजिश के तहत हटा दिया गया। आज हम कुछ नया नहीं मांग रहे, हम वही मांग रहे हैं जो ऐतिहासिक रूप से हमारा था। हम याचक नहीं, इस माटी के असली मालिक हैं और जनगणना 2026-27 हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य तय करने वाली है।

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1. 5 जनवरी 2011 का वह ऐतिहासिक सत्य: हम ही भारत के असली मालिक हैं!

​सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी 2011 के अपने ऐतिहासिक फैसले में यह पत्थर की लकीर खींच दी थी कि भारत के आदिवासी ही इस देश के ‘मूल निवासी’ और ‘असली मालिक’ हैं। हम वह 8% लोग हैं जिनका इस माटी पर पहला अधिकार है। हमारी परंपराएं, हमारे रीति-रिवाज और हमारी प्रकृति पूजा किसी भी अन्य धर्म का हिस्सा नहीं हैं।

विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें: 5 जनवरी 2011 सुप्रीम कोर्ट जजमेंट: आदिवासी ही हैं भारत के असली मालिक

2. सामाजिक संगठनों का एकजुट उलगुलान: जयस और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी

​आज यह मांग किसी एक व्यक्ति या दल की नहीं, बल्कि समूचे आदिवासी समाज की सामूहिक चेतना बन चुकी है। जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) जैसे संगठनों ने इसे एक जन-आंदोलन बना दिया है। जयस संगठन के प्रदेश अध्यक्ष भीम सिंह गिरवाल लगातार जमीन पर उतरकर आदिवासियों को उनकी स्वतंत्र पहचान के लिए जागरूक कर रहे हैं।

“जयस संगठन के प्रदेश अध्यक्ष भीम सिंह गिरवाल के ओजस्वी संबोधन और इस आंदोलन की जमीनी हकीकत को आप इस यूट्यूब लिंक पर देख सकते हैं:”

तीखी बहस देखें पूरा वीडियो – YouTube Link]

​वहीं, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (गोंतपा) जैसी राजनीतिक और सामाजिक शक्तियां भी ‘गोंडवाना धर्म कोड’ की मांग को लेकर मुखर हैं। समाज के हर तरफ सामाजिक संगठनों में धर्मकोड की मांग हो रही है।

3. उमंग सिंघार की हुंकार और बढ़ता राजनीतिक समर्थन

​आदिवासी समाज की इस जायज मांग को अब राजनैतिक गलियारों में भी मजबूती मिल रही है। मध्यप्रदेश के कद्दावर आदिवासी नेता उमंग सिंघार ने साफ कहा है कि यदि जनगणना के फॉर्म में आदिवासियों के लिए अलग ‘धर्म कोड’ नहीं आता, तो हमें अपनी पहचान दर्ज कराने के लिए खुद आगे आना होगा। उन्होंने आह्वान किया है कि लाखों की संख्या में आवेदन राष्ट्रपति के पास भेजे जाएं ताकि दिल्ली को पता चले कि आदिवासियों की ताकत क्या है।

“आदिवासी अधिकारों की लड़ाई और ‘आदिवासी धर्म कोड’ की मुखर मांग को लेकर उमंग सिंघार जी का यह उद्बोधन हर आदिवासी को जागृत करने के लिए पर्याप्त है, जिसे आप यहाँ देख सकते हैं:”[यहाँ उमंग सिंघार जी के वीडियो का लिंक ]

4. क्या है ‘कॉलम 7’ और अलग धर्म कोड की जरूरत?

​वर्तमान में जनगणना फॉर्म में केवल 6 धर्मों (हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन) के लिए कोड हैं। आदिवासियों को मजबूरी में ‘अन्य’ या किसी और धर्म के खाने में खुद को दर्ज करना पड़ता है। हमारी मांग है कि ‘कॉलम 7’ में ‘आदिवासी धर्म’ को शामिल किया जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो हमारी संख्या कम दिखाई जाएगी और हमारे संवैधानिक अधिकार खतरे में पड़ सकते हैं।

5. संवैधानिक अधिकारों की ढाल: अनुच्छेद 342 और 366

​संविधान का अनुच्छेद 342 और 366 आदिवासियों को एक विशेष संवैधानिक पहचान देते हैं। लेकिन बिना एक अलग धर्म कोड के, यह पहचान प्रशासनिक रिकॉर्ड में धुंधली होती जा रही है।

विशेष जानकारी: आदिवासियों की पहचान और उनके संवैधानिक अधिकारों के बारे में विस्तार से जानने के लिए हमारा यह लेख जरूर पढ़ें: आदिवासी पहचान और संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 342 और 366)

6. समता जजमेंट 1997: हमारी जमीन का सुरक्षा कवच

​जब हम अपनी पहचान की बात करते हैं, तो हमें अपनी जमीन की रक्षा भी याद रखनी होगी। समता जजमेंट 1997 वह कानूनी हथियार है जिसने कॉर्पोरेट ताकतों को हमारी जमीन छीनने से रोका था। हमारी पहचान ही हमारी जमीन से जुड़ी है।

जरूर पढ़ें: समता जजमेंट 1997: आदिवासियों के लिए सुरक्षा कवच

7. प्रकृति धर्म: हमारी जीवनशैली ही हमारा धर्म है

​हम आदिवासियों का धर्म कोई किताब नहीं, बल्कि यह जल, जंगल और जमीन है। हम प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीते हैं। जब हमें जनगणना में किसी अन्य धर्म के साथ जोड़ दिया जाता है, तो हमारी वह ‘प्रकृति पूजक’ पहचान खत्म हो जाती है जिसे बचाना जयस, गोंतपा और तमाम आदिवासी संगठनों का मुख्य लक्ष्य है।

8. क्यों जरूरी है यह अलग कोड?

  1. जनसंख्या की सटीक गिनती: ताकि हमारी असली संख्या का पता चले।
  2. संसाधनों का सही बंटवारा: हमारी जनसंख्या के आधार पर ही विकास का बजट तय होता है।
  3. रूढ़िवादी परंपराओं का संरक्षण: हमारी प्राचीन प्रथाओं को कानूनी मान्यता मिले।
  4. अस्तित्व की रक्षा: अपनी स्वतंत्र धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखना।

9. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड: उलगुलान की नई आहट

​यह आंदोलन अब एक राज्य तक सीमित नहीं है। झारखंड से लेकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के जंगलों तक, हर जगह युवा अब अपने अधिकारों के लिए जागरूक हो रहे हैं। उमंग सिंघार और भीम सिंह गिरवाल जैसे नेतृत्व इस आवाज को और धार दे रहे हैं।

10. निष्कर्ष: अब नहीं जागे तो कब जागोगे?

​निष्कर्षतः, 2026 की जनगणना हमारे अस्तित्व की परीक्षा है। चाहे वह उमंग सिंघार हों, भीम सिंह गिरवाल हों या गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के कार्यकर्ता—आज पूरा आदिवासी समाज एक सुर में अपनी पहचान मांग रहा है। जैसा कि हमने देखा, अंग्रेजों के शासन में 1951 तक जो हक हमें प्राप्त था, वह स्वतंत्र भारत में हमसे क्यों छीना गया? यह सवाल आज हर आदिवासी युवा पूछ रहा है। हमें फॉर्म भरते समय गर्व से कहना होगा— “हम आदिवासी हैं, हमारी पहचान प्रकृति है!”

जय जोहार! जय आदिवासी! जय गोंडवाना!

1. 1951 से पहले की जनगणना का इतिहास (सरकारी डेटा):

लिंक: Census of India – Historical Data

  • “भारत सरकार के आधिकारिक जनगणना विभाग के पुराने रिकॉर्ड्स इस बात की पुष्टि करते हैं कि 1951 से पहले आदिवासियों को ‘एनिमिस्ट’ (Animist) के रूप में अलग वर्गीकृत किया जाता था।”)

​2. सरना कोड और आदिवासी धर्म पर न्यूज आर्टिकल (द हिंदू/इंडियन एक्सप्रेस):

​विश्वसनीय मीडिया रिपोर्ट्स

लिंक (द हिंदू): The demand for Sarna code (यह लिंक झारखंड विधानसभा में पारित सरना कोड की मांग को वेरीफाई करता है।)

​3. संविधान का अनुच्छेद 342 (संवैधानिक आधार):

लिंक: Article 342 – Constitution of India

( आदिवासी पहचान संवैधानिक है।)

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