ADIVASI LAW

रूढ़ि प्रथा, पारंपरिक ग्राम सभा 13,3(क)

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रूढ़ि प्रथा, पारंपरिक ग्राम सभा 13,3(क)

आदिवासी जननायक एवं महापुरुष (Tribal Icons) ​(इसमें टंट्या मामा, बिरसा मुंडा और अन्य पुरखों का इतिहास

खौफ का दूसरा नाम ‘भील पलटन’: जननायक टंट्या मामा का उलगुलान और 243-M की शक्ति!

न्यूज़पेपर सुर्खी (1889): “लंदन का ‘द पॉल मॉल गजट’ कांप उठा था जब उसने भारत के इस ‘मसीहा’ की वीरता की कहानियाँ छापी थीं। गद्दारों ने डकैत कहा, पर दुनिया ने उन्हें ‘जननायक’ माना!”

महत्वाकांक्षी दलाल, साहूकार और ‘भील पलटन’ की ललकार

​जब इस देश के महत्वाकांक्षी दलाल, अंग्रेज हुकूमत और वे साहूकार (जो भारत में व्यापार करने आए थे और लुटेरे बन गए) मिलकर हमारे मजबूर, अनपढ़ और प्राकृतिक समुदाय (प्रकृति पूजक) को कुचल रहे थे, उनके अनाज और फसलों को कुचक्र रचकर लूट रहे थे, तब टंट्या मामा ने अपनी “भील पलटन” तैयार की।

​यह पलटन नहीं, मौत का वो साया था जो अत्याचारी अंग्रेजों और इन व्यापारी साहूकारों की रातों की नींद उड़ा देता था। मामा अपनी इस पलटन के साथ सरकारी खजानों और साहूकारों की तिजोरियों पर बिजली की तरह गिरते थे और लूटा हुआ एक-एक दाना वापस अपने उन लोगों तक पहुँचाते थे जिनसे वह छीना गया था।

क्या आप जानते हैं? टंट्या मामा की ख्याति इतनी थी कि उन्हें कई नामों से पूजा जाता है:

  • इंडियन रॉबिनहुड: अंग्रेजों द्वारा दी गई उपाधि (मसीहा)।
  • जननायक: जनता का असली नायक।
  • टंट्या मामा: प्यार और सम्मान से दिया गया नाम (आज भी लोग मामा के नाम की कसम खाते हैं)।
  • गर्वित आदिवासी मसीहा: प्राकृतिक अधिकारों का रक्षक।

जानिए अनुच्छेद 243-M की शक्ति

​टंट्या मामा जिस हक के लिए लड़े, वह आज संविधान के अनुच्छेद 243-M में सुरक्षित है। यही वह कानून है जो ‘सरकारी पंचायत’ को आपके रूढ़िगत क्षेत्रों में आने से रोकता है। टंट्या मामा का संघर्ष ही आज हमें यह कहने की ताकत देता है कि हमारी ‘पारंपरिक ग्राम सभा’ ही सर्वोपरि है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान: विनायक दामोदर का खुलासा

​इस संघर्ष की गूँज सात समंदर पार तक थी। जब विनायक दामोदर लंदन के ‘इंडिया हाउस’ में थे, तब उन्होंने वहाँ के पुस्तकालयों में टंट्या मामा के बारे में ब्रिटिश अखबारों (The Pall Mall Gazette) की रिपोर्ट्स पढ़ी थीं। उन्होंने दुनिया को बताया कि जिसे अंग्रेज ‘डाकू’ कह रहे हैं, वह दरअसल अपनी माटी का रक्षक और स्वराज का असली सेनानी है।

अदृश्य शक्ति और अंग्रेजों का ‘पातालपानी’ वाला खौफ

​अंग्रेज पुलिस का मानना था कि मामा के पास ‘अलौकिक शक्तियां’ हैं। उनकी ‘भील पलटन’ गोरिल्ला युद्ध में इतनी माहिर थी कि अंग्रेज अपनी भारी फौज के बावजूद उनके पैरों की धूल भी नहीं पकड़ पाए।

​अंत में, अपनों के धोखे से उन्हें गिरफ्तार किया गया। अंग्रेजों के दिल में भय इतना था कि 4 दिसंबर 1889 को फांसी देने के बाद, उनकी लाश तक उनके अपनों को नहीं दी गई। चुपके से पातालपानी के जंगलों में ले जाकर फेंक दिया गया, ताकि कहीं उनकी समाधि से फिर से क्रांति की आग न भड़क जाए।

क्रांति के तीन प्रमुख उलगुलान

  1. अजेय योद्धा और भील पलटन: जंगल का असली राजा कौन है, यह मामा ने अंग्रेजों को सिखा दिया। अंग्रेज पुलिस डायरियों में उन्हें ‘अदृश्य साया’ कहा गया।
  2. संवैधानिक संप्रभुता का बीज: टंट्या मामा का संघर्ष ही आज के अनुच्छेद 244(1) और PESA एक्ट की असली ताकत है।
  3. अमर विरासत: आज पातालपानी में हर ट्रेन रुककर टंट्या मामा को सलामी देती है। यह इस बात का प्रमाण है कि जननायक कभी मरते नहीं।

उलगुलान जिंदाबाद!

जय जोहार, जय आदिवासी!

ऐतिहासिक प्रमाण (Sources):

  • विदेशी रिकॉर्ड: ‘The Pall Mall Gazette’ (लंदन), 1889.
  • साहित्यिक प्रमाण: विनायक दामोदर सावरकर की कृतियाँ।
  • कानूनी दस्तावेज: ‘The Scheduled Districts Act, 1874’ और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243-M

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जोहार! मैं आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों, रूढ़ि प्रथा और पारंपरिक ग्राम सभा की रक्षा के लिए समर्पित हूँ। adivasilaw.in के माध्यम से मेरा लक्ष्य हर गांव तक अनुच्छेद 13,3(क), 244(1) और PESA एक्ट की सही जानकारी पहुँचाना है ताकि हमारी ग्राम सभा सशक्त और स्वायत्त बनी रहे।"