भील प्रदेश: ‘देशज’ मालिकों की विरासत पर ‘संवैधानिक डकैती’ का पर्दाफाश
यह कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं है, यह 5000 साल पुरानी पहचान को मिटाने के लिए रचे गए ‘प्रशासनिक और राजनीतिक षड्यंत्र’ के खिलाफ एक युद्ध है। जब दुनिया सभ्य नहीं हुई थी, तब हम इस मिट्टी के ‘मूल बीज मालिक’ थे।
1. आदिवासियों की पहचान ‘देशज’ से ‘वनवासी’ बनाने के पीछे का असली षड्यंत्र
क्या हमें जानबूझकर ‘वनवासी’ कहा जाता है ताकि हम अपनी पहचान खो दें? हाँ! क्योंकि ‘देशज’ कहने से ‘मालिकाना हक’ की खुशबू आती है, जबकि ‘वनवासी’ कहने से हमें केवल ‘जंगल का निवासी’ बताकर हमारे हक छीने जाते हैं। यह नाम बदलकर असली हकदार को हक से दूर करने की सबसे बड़ी बदमाशी
2. जनगणना का महा-षड्यंत्र: पहचान की ‘सुनियोजित हत्या’
| ” वर्ष “ | “पहचान “ |
| 1871 से 1891 | Aboriginals (देशज मूल निवासी मालिक) |
| 1901 से 1931 | Animist (प्रकृति पूजक) |
| 1941 | Tribes (स्वतंत्र पहचान) |
| 1951 के बाद, अब तक | हमें हिंदू/अन्य की श्रेणी में डाल दिया गया।(पहचान की चोरी) |
हमें जानबूझकर ‘हिंदू’ कॉलम में धकेला गया ताकि हमारी संख्या बल को खत्म किया जा सके। यह राजनीति का शिकार होना नहीं है, बल्कि जानबूझकर शिकार किया जाना है।
⚔️ 3. भिलांचल का ‘खूनी बंटवारा’: हमारी शक्ति को तोड़कर बांटना
भिलांचल को राजस्थान, गुजरात, मप्र और महाराष्ट्र में बांटना कोई प्रशासनिक मजबूरी नहीं थी, बल्कि एक गहरा षड्यंत्र था। चालाकी: “यह बंटवारा ‘फूट डालो और राज करो’ का देसी वर्जन था। अगर ये जिले आज एक प्रदेश होते, तो हम किसी राजनैतिक दल के गुलाम नहीं, बल्कि खुद के संसाधनों के मालिक होते। हमें चार राज्यों की जेलों में इसलिए बांटा गया ताकि हमारी एकता कभी एक ‘Administrative Unit’ न बन सके।”
📜 4. ऐतिहासिक दस्तावेज: 1881, 1917, 1935 और 1956 का सच
- 1881 का गैजेट: इसमें भिलांचल को ‘अनुसूचित जिला’ मानकर बाहरी कानूनों से मुक्त रखा गया था।
- 1917 का अधिनियम: आदिवासियों की जमीन और रीति-रिवाजों को विशेष संवैधानिक सुरक्षा दी गई थी।
- 1935 का एक्ट (Section 91/92): यहाँ साफ लिखा था कि आदिवासी क्षेत्र ‘Excluded Areas’ हैं। यहाँ बाहरी संसद का नहीं, सिर्फ आदिवासियों की ‘रूढ़ि-प्रथा’ का राज चलेगा।
- 1956 का राज्य पुनर्गठन: यह वह ‘पाप’ था जिसने एक अखंड भिलांचल को चार राज्यों में काटकर हमारी राजनैतिक ताकत का कत्ल कर दिया।
🛡️ 5. संवैधानिक ब्रह्मास्त्र: अनुच्छेद 13(3)(क), 243-M और 244
- अनुच्छेद 13(3)(क): आपकी ‘रूढ़ि और प्रथा’ (Customary Law) ही कानून है।
- अनुच्छेद 243-M: यह कहता है कि ‘पंचायती राज’ यहाँ हस्तक्षेप नहीं करेगा, यहाँ ‘पारंपरिक ग्राम सभा’ ही मालिक है।
- अनुच्छेद 244(1): पाँचवीं अनुसूची राज्यपाल को आपकी रक्षा के लिए ‘विशेषाधिकार’ देती है, जिसे फाइलों में दफन कर दिया गया।
- अनुच्छेद 342 और 366: ये आपकी ‘विशिष्ट पहचान’ के रक्षक हैं।
🚀 निष्कर्ष: ‘पहचान’ वापस लेने का समय
आंखें खोलकर देखो! 1881 से 1956 तक के दस्तावेज और आज का संविधान दोनों गवाह हैं। पहचान बदलकर असली हकदार को हक से दूर करना ही इस तंत्र की सबसे बड़ी ‘बदमाशी’ है। भील प्रदेश का गठन केवल एक नया राज्य बनाना नहीं, बल्कि उस ‘ऐतिहासिक डकैती’ का हिसाब लेना है।
🛡️ तथ्यों की प्रमाणिकता (Verify the Facts)
इस लेख में दी गई जानकारी को आप स्वयं इन सरकारी और संवैधानिक दस्तावेजों में प्रमाणित कर सकते हैं:
- Imperial Gazetteer of India (1881-1908) – ‘अनुसूचित जिला’ और आदिवासियों की स्वायत्तता का प्रमाण।
- Government of India Act 1935 (Section 91/92) – ‘Excluded Areas’ की वैधानिक स्थिति के लिए पेज नंबर 57-58 देखें।
- Constitution of India (Article 13, 243-M, 244) – रूढ़ि प्रथा और ग्राम सभा की सर्वोच्चता का आधिकारिक पाठ।
- States Reorganisation Commission Report (1956) – भिलांचल के भौगोलिक बंटवारे का ऐतिहासिक रिकॉर्ड।

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