आबकारी अधिनियम और PESA एक्ट: क्या ग्राम सभा बंद करवा सकती है शराब का ठेका?

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भूमिका: आदिवासी स्वाभिमान और ग्राम सभा की शक्ति

आबकारी अधिनियम और PESA एक्ट के तहत ग्राम सभा को मादक द्रव्यों के नियंत्रण का पूरा अधिकार है। यानी आपकी ग्राम सभा तय कर सकती है कि गांव में शराब बिकेगी या नहीं।

भारत का संविधान अनुसूचित क्षेत्रों (5वीं अनुसूची) को विशेष संरक्षण प्रदान करता है। मध्यप्रदेश के खरगोन, बैतूल, शहडोल, झाबुआ, अलीराजपुर, डिंडोरी जैसे जिलों में – जहाँ आदिवासी संस्कृति और परंपराएं रची-बसी हैं – वहां PESA कानून (Panchayat Extension to Scheduled Areas Act, 1996) ग्राम सभा को बहुत बड़ी शक्ति देता है।

सदियों से आदिवासी समाज नशे के खिलाफ संघर्ष करता आया है। बिरसा मुंडा, तांत्या भील, रेंड माझी और हजारों नामी-गुमनाम वीरों ने अपने समाज को नशे के कुचक्र से बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। आज भी गांवों में शराब के ठेके सामाजिक ताने-बाने को तोड़ रहे हैं। युवा बर्बाद हो रहे हैं, परिवार टूट रहे हैं, और महिलाओं की मुश्किलें बढ़ रही हैं।

ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी है कि क्या ग्राम सभा शराब का ठेका बंद करवा सकती है? PESA कानून आपको क्या अधिकार देता है? और आबकारी अधिनियम के तहत क्या प्रावधान हैं? आइए, विस्तार से समझते हैं।

1. PESA कानून 1996: ग्राम सभा ही असली मालिक है

PESA एक्ट 24 दिसंबर 1996 को लागू हुआ। इस कानून का मुख्य उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में पारंपरिक ग्राम सभाओं को संवैधानिक ताकत देना है।

ग्राम सभा को क्या-क्या अधिकार हैं?

भारत सरकार के जनजातीय मामलों के मंत्रालय के अनुसार, PESA के तहत ग्राम सभा को ये शक्तियां दी गई हैं:

अधिकारविवरण
सामुदायिक संसाधनों पर नियंत्रणग्राम सभा गांव के प्राकृतिक संसाधनों (जल स्रोत, जंगल, जमीन) की रक्षा करेगी
जमीन अधिग्रहण में सलाहभूमि अधिग्रहण के मामलों में ग्राम सभा की सलाह अनिवार्य है
खनन की अनुमतिछोटे खनिजों के लिए खनन पट्टे देने में ग्राम सभा की मंजूरी जरूरी है
शराब का नियंत्रणमादक द्रव्यों की बिक्री और सेवन को नियंत्रित या प्रतिबंधित करना
ग्रामीण बाजारगांव के बाजारों का प्रबंधन करना
लघु वनोपजग्राम सभा के पास लघु वनोपज (महुआ, हर्रा, बहेड़ा, तेंदू पत्ता) का स्वामित्व होगा

शराब पर नियंत्रण की शक्ति

PESA एक्ट की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह ग्राम सभा को मादक द्रव्यों के नियंत्रण का पूरा अधिकार देता है।

सीधी भाषा में समझिए:

  • ग्राम सभा तय कर सकती है कि गांव में शराब बिकेगी या नहीं
  • ग्राम सभा शराब की दुकान से लेकर शराब पीने की जगह तक पर नियंत्रण रख सकती है
  • ग्राम सभा पारंपरिक मादक पदार्थों (जैसे महुआ से बनी शराब) के सेवन की मात्रा भी तय कर सकती है

2. मध्यप्रदेश में PESA का क्रियान्वयन – ऐतिहासिक कदम

14 नवंबर 2022 को, जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर, तत्कालीन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शहडोल जिले से मध्यप्रदेश में PESA एक्ट के क्रियान्वयन की शुरुआत की। प्रदेश के 89 जनजातीय विकास खंडों में यह कानून लागू हुआ।

तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने साफ कहा था:

  • “अब बिना ग्राम सभा की अनुमति के नई शराब/गांजा की दुकान नहीं खुलेगी”
  • “अगर कोई शराब की दुकान स्कूल, अस्पताल, धार्मिक स्थान के पास है, तो ग्राम सभा उसे हटाने की सिफारिश कर सकती है”
  • “ग्राम सभा चार दिन से अधिक किसी भी दिन शराब बंदी के लिए कलेक्टर को सिफारिश कर सकती है”
  • “ग्राम सभा सार्वजनिक स्थान पर शराब पीने पर रोक लगा सकती है”

यह बहुत बड़ी बात है। यानी आपकी ग्राम सभा चाहे तो साल में 365 दिन शराब बंद कर सकती है।

3. मध्यप्रदेश आबकारी अधिनियम का कानूनी पक्ष

मध्यप्रदेश आबकारी अधिनियम के तहत भी कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान हैं जो ग्राम सभा के अधिकारों को मजबूत करते हैं:

  1. सार्वजनिक शांति का उल्लंघन: यदि किसी शराब की दुकान से सार्वजनिक शांति भंग होती है, तो जिला कलेक्टर उस दुकान को हटाने या बंद करने का आदेश दे सकता है।
  2. धार्मिक और शैक्षणिक संस्थानों से दूरी: कानून के अनुसार, मंदिर, मस्जिद, स्कूल या अस्पताल की एक निश्चित दूरी के भीतर शराब की दुकान नहीं हो सकती। अगर आपके गांव में ऐसा है, तो यह अधिनियम का सीधा उल्लंघन है।
  3. NOC अनिवार्य: ग्राम सभा का NOC (अनापत्ति प्रमाण पत्र) शराब की दुकान खोलने या नवीनीकरण के लिए जरूरी है। महाराष्ट्र में भी ऐसा ही नियम है – ग्रामीण क्षेत्रों में शराब की दुकान के लिए ग्राम सभा का प्रस्ताव अनिवार्य है।

4. सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले

के. गुरुप्रसाद बनाम कर्नाटक राज्य

इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि शराब का व्यापार करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है। यह अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत संरक्षित कोई मौलिक अधिकार नहीं। यह सिर्फ सरकार द्वारा दी गई एक ‘छूट’ (Privilege) है।

मतलब साफ है – किसी ठेकेदार को कोर्ट जाकर यह नहीं कह सकता कि “मुझे शराब बेचने का अधिकार है।” उसे ऐसा कोई अधिकार नहीं है।

बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2016 में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया। कोर्ट ने कहा:

  • ग्राम सभा शराब की दुकान के नवीनीकरण (renewal) के लिए भी अपनी राय दे सकती है
  • ग्राम सभा का प्रस्ताव बाध्यकारी (binding) होता है
  • अगर ग्राम सभा शराब की दुकान के खिलाफ है, तो 2008 के आदेश के तहत दुकान बंद कराई जा सकती है

5. सफलता की कहानी: तेलंगाना के 253 गांव

PESA के तहत शराब बंदी की यह सबसे बड़ी सफलता की कहानी है।

तेलंगाना के आसिफाबाद जिले में, आदिवासी संगठनों ने PESA एक्ट का इस्तेमाल करते हुए तीन मंडलों (जैनूर, सिरपुर, लिंगापुर) के 253 गांवों में शराब पूरी तरह बंद करवा दी।

कैसे हुआ यह कमाल?

  • आदिवासी संगठनों ने 3 महीने तक जागरूकता अभियान चलाया
  • हर गांव में ग्राम सभा की बैठकें हुईं
  • लिखित प्रस्ताव पारित किया गया – “हमारे क्षेत्र में शराब की बिक्री नहीं होगी”
  • ये प्रस्ताव उत्पादन एवं आबकारी विभाग को भेजे गए
  • विभाग ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिए और तीनों मंडलों में शराब की दुकानों के परमिट बंद कर दिए

जिला उत्पादन एवं आबकारी अधीक्षक राज्यलक्ष्मी ने स्पष्ट किया कि “PESA के तहत ग्राम सभा के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया है और अब इन गांवों में शराब बेचने वालों के खिलाफ कार्रवाई होगी”।

आदिवासी महिला संगठन की अध्यक्ष गोदाम जंगू भाई ने कहा, “हमने तीन मंडलों में शराब पूरी तरह खत्म करने का फैसला किया है। बेल्ट शॉप हो या वाइन शॉप – कहीं भी शराब नहीं बिकेगी”।

यह साबित करता है कि PESA कानून कागजों तक सीमित नहीं है – अगर ग्राम सभा एकजुट हो, तो शराब बंद करवाई जा सकती है।

6. शराब बंदी के लिए प्रस्ताव कैसे पारित करें? (Step by Step)

अब आपके लिए सबसे जरूरी सवाल – आप अपने गांव में शराब कैसे बंद करवा सकते हैं?

चरणक्या करना है
Step 1विशेष ग्राम सभा बुलाएं – PESA नियमों के तहत, कोरम (जरूरी संख्या) पूरा करते हुए एक विशेष ग्राम सभा बुलाएं। इसमें गांव के सभी वयस्क (18+) सदस्य शामिल हो सकते हैं।
Step 2लिखित प्रस्ताव पारित करें – सर्वसम्मति से या बहुमत से लिखित प्रस्ताव पारित करें। प्रस्ताव में साफ लिखें कि शराब की दुकान सामाजिक और नैतिक पतन का कारण है, इससे युवा पीढ़ी बर्बाद हो रही है, घरेलू हिंसा और अपराध बढ़ रहे हैं।
Step 3प्रस्ताव की प्रमाणित कॉपी जिला प्रशासन को भेजें – प्रस्ताव की एक प्रति जिला कलेक्टर, जिला आबकारी अधिकारी, अनुविभागीय अधिकारी (SDO) और तहसीलदार को भेजें।
Step 4अनुविभागीय अधिकारी को ज्ञापन दें – ग्राम सभा के सदस्य SDO को ज्ञापन देकर अपनी मांग रखें। धैर्य रखें और लगातार पीछा करें।
Step 5कानूनी नोटिस – यदि 30 दिनों के भीतर कार्रवाई न हो, तो कानूनी सहायता लेकर आबकारी अधिनियम और PESA के उल्लंघन का नोटिस भेजें।

7. तुलनात्मक तालिका: PESA के अधिकार बनाम आम धारणा

पहलूआम धारणाPESA एक्ट के तहत सच्चाई
शराब दुकान बंद करने का अधिकारकेवल कलेक्टर को हैग्राम सभा को भी है
शराब दुकान के नवीनीकरण में ग्राम सभा की रायजरूरी नहींबाध्यकारी है
NOC की अनिवार्यताकेवल औपचारिकताबिना NOC दुकान नहीं खुल सकती
शराब का व्यापारमौलिक अधिकार हैकोई मौलिक अधिकार नहीं है (सुप्रीम कोर्ट)
ग्राम सभा की शक्तिकेवल सलाहकारीसर्वोच्च और बाध्यकारी

8. शराब के सामाजिक दुष्प्रभाव

शराब केवल स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को तोड़ती है:

दुष्प्रभावविवरण
आर्थिक बर्बादीएक गरीब परिवार की दैनिक मजदूरी शराब में उड़ जाती है
घरेलू हिंसानशे में होने वाले झगड़े महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार का कारण बनते हैं
स्वास्थ्य समस्याएंलिवर की बीमारी, पेट के रोग, दिमागी कमजोरी
युवा पीढ़ी का विनाशपढ़ाई-लिखाई छूट जाती है, भविष्य अंधकारमय हो जाता है
सांस्कृतिक पतनपारंपरिक त्योहारों और रीति-रिवाजों का ह्रास

आदिवासी समाज की संस्कृति ‘जोहार’ और ‘सेवा’ की है – शराब इस संस्कृति को खत्म कर रही है। सतपुड़ा की पहाड़ियों और नर्मदा के किनारे बसे हमारे गांवों में शराब बंद होना ही सच्ची ‘आदिवासी क्रांति’ है।

9. 10 महत्वपूर्ण बिंदु (10 Key Takeaways)

  1. PESA एक्ट 1996 के तहत ग्राम सभा को शराब बंदी का पूर्ण वैधानिक अधिकार प्राप्त है।
  2. मध्यप्रदेश में 2022 से पूरे 89 जनजातीय विकास खंडों में PESA लागू हो चुका है।
  3. शराब का व्यापार कोई मौलिक अधिकार नहीं है – यह सिर्फ सरकारी लाइसेंस पर निर्भर है (सुप्रीम कोर्ट)।
  4. सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने कई फैसलों में ग्राम सभा के अधिकारों को सर्वोपरि माना है।
  5. किसी भी मंदिर, स्कूल, अस्पताल या सार्वजनिक स्थान के पास शराब दुकान आबकारी अधिनियम का उल्लंघन है।
  6. ग्राम सभा को शराब दुकान के लिए NOC देने या रद्द करने का अधिकार है।
  7. तेलंगाना के 253 गांवों ने PESA के तहत शराब पूरी तरह बंद करवाई है – सबसे बड़ी सफलता।
  8. ग्राम सभा का लिखित प्रस्ताव एक कानूनी दस्तावेज है जिसे जिला प्रशासन अनदेखा नहीं कर सकता।
  9. एकजुटता और कानूनी ज्ञान ही शराब माफियाओं के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है।
  10. शराब बंदी के लिए महिलाओं की सक्रिय भागीदारी बहुत जरूरी है।

10. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. सवाल: क्या ग्राम सभा पहले से चल रही शराब की दुकान बंद करवा सकती है?

जवाब: हाँ। PESA एक्ट और मध्यप्रदेश के नियमों के अनुसार, ग्राम सभा चल रही दुकान के नवीनीकरण के लिए अपनी सहमति देने से मना कर सकती है। इसके अलावा, 2008 के आदेश के तहत ग्राम सभा सीधे दुकान बंद करने की सिफारिश कर सकती है।

2. सवाल: क्या ग्राम सभा के प्रस्ताव के बिना शराब की दुकान खोली जा सकती है?

जवाब: नहीं। यह PESA एक्ट और आबकारी अधिनियम दोनों का उल्लंघन है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि ग्राम सभा का प्रस्ताव अनिवार्य है।

3. सवाल: क्या सिर्फ बहुमत काफी है या सर्वसम्मति चाहिए?

जवाब: PESA के तहत, अधिकांश मामलों में बहुमत काफी है। लेकिन सर्वसम्मति से ज्यादा ताकत होती है। जितना अधिक एकजुट होंगे, उतना ही मजबूत प्रस्ताव होगा।

4. सवाल: क्या जिला कलेक्टर ग्राम सभा के प्रस्ताव को नकार सकते हैं?

जवाब: सामान्यतः नहीं। PESA एक्ट ग्राम सभा को सर्वोच्च शक्ति देता है। लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से (जैसे प्रस्ताव में कमी) कलेक्टर वापस कर सकता है। तब ग्राम सभा को दोबारा सही प्रस्ताव बनाकर भेजना चाहिए।

5. सवाल: अगर अधिकारी कार्रवाई न करें तो क्या करें?

जवाब: पहले तहसीलदार और कलेक्टर से शिकायत करें। फिर राज्य के गृह विभाग में शिकायत करें। अंत में, मानवाधिकार आयोग या हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सकते हैं।

6. सवाल: क्या PESA सिर्फ MP में लागू है?

जवाब: नहीं। PESA देश के कुल 10 राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों में लागू है – मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और हिमाचल प्रदेश। हर राज्य ने अपने अलग नियम बनाए हैं।

7. सवाल: क्या ग्राम सभा पारंपरिक शराब (महुआ) पर भी रोक लगा सकती है?

जवाब: हाँ। PESA नियमों के तहत ग्राम सभा पारंपरिक मादक पदार्थों के सेवन की मात्रा तय कर सकती है और उसे प्रतिबंधित भी कर सकती है।

8. सवाल: शराब बंदी के लिए ग्राम सभा में कितने लोगों की जरूरत है?

जवाब: कम से कम 10% ग्रामीण या 50 व्यक्ति (जो भी कम हो) उपस्थित होना जरूरी है। लेकिन सफलता के लिए जितना ज्यादा लोग, उतना अच्छा।

9. सवाल: क्या शराब बंदी के लिए महिलाओं की भागीदारी जरूरी है?

जवाब: बिल्कुल। महिलाएं सबसे ज्यादा पीड़ित होती हैं। तेलंगाना में आदिवासी महिला संगठन ने ही पूरी मुहिम का नेतृत्व किया था। ग्राम सभा में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से सफलता की संभावना बढ़ जाती है।

10. सवाल: क्या नगर निगम इलाकों में भी ग्राम सभा लागू है?

जवाब: नहीं। PESA सिर्फ ग्रामीण अनुसूचित क्षेत्रों (जनजातीय विकास खंडों) में लागू है, शहरों में नहीं।

11. निष्कर्ष: जागरूकता ही जीत है

आबकारी अधिनियम और PESA कानून केवल कागज पर लिखे शब्द नहीं हैं – ये आपके हथियार हैं। सुप्रीम कोर्ट से लेकर मध्यप्रदेश की धरती तक, कानून आपके साथ खड़ा है।

यदि ग्राम सभा एकजुट है और लोग जागरूक हैं, तो कोई भी ठेकेदार या अवैध संचालक आपकी इच्छा के खिलाफ शराब नहीं बेच सकता।

आपका गांव, आपका जंगल, आपकी जमीन, आपकी संस्कृति – सब आपके हाथ में है।

याद रखिए:

  • नशा मुक्ति ही सच्ची आज़ादी है
  • ग्राम सभा की एकजुटता ही सबसे बड़ी ताकत है
  • कानून आपके साथ है, आपको बस जागरूक होना है

शराब के खिलाफ यह लड़ाई हमारे पूर्वजों की धरोहर की लड़ाई है। बिरसा मुंडा, तांत्या मामा और हजारों अज्ञात वीरों ने हमारे लिए यह धरती बचाई थी। अब बारी हमारी है – इसी धरती को नशा मुक्त करने की।

जब ग्राम सभा शराब बंदी का निर्णय लेती है, तो वह केवल एक दुकान बंद नहीं करती – वह आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करती है।

12. आंतरिक लिंक (Internal Links)

13. बाहरी लिंक (External DoFollow Resources)

14. Adivasilaw.in का उद्देश्य

AdivasiLaw.in का एक ही उद्देश्य है – हर आदिवासी तक उसके अधिकारों, कानूनी जानकारी और संघर्षों की सच्चाई पहुंचाना। हम चाहते हैं कि ग्राम सभा की शक्ति का उपयोग करके आदिवासी समाज अपने गांवों को नशा मुक्त बनाएं और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करें।

15. Call to Action

अगर यह लेख आपको जागरूक करता है, तो इसे हर उस आदिवासी तक पहुंचाएं जो शराब के दुष्प्रभावों से पीड़ित है।

कमेंट में लिखें – “ग्राम सभा की एकजुटता ही शराब मुक्ति की जीत है”

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जय जोहार! जय आदिवासी!


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