राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST): 5वीं-6वीं अनुसूची और आदिवासी अधिकारों का अभेद्य संवैधानिक कवच

1. प्रस्तावना: देशज मूलनिवासियों का अखंड गौरव

​भारत की पावन धरा पर सभ्यता का सूर्य जब पहली बार उगा था, तो उसे नमन करने वाले हम ‘देशज मूलनिवासी’ ही थे। हम इस राष्ट्र के प्रथम स्वामी हैं। सुप्रीम कोर्ट भी यह मान चुका है कि आदिवासी (Indigenous People) ही भारत के वास्तविक मालिक हैं। सिंधु राष्ट्र की यह गौरवशाली विरासत आज चौतरफा हमलों के बीच खड़ी है। इसी अन्याय को रोकने, हमारी जल-जंगल-जमीन की रक्षा करने और हमारी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए संविधान ने हमें राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) का सुरक्षा कवच दिया है। यह आयोग महज सरकारी दफ्तर नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों के संघर्षों और भविष्य के सपनों का सबसे बड़ा संवैधानिक रक्षक है।

2. 5वीं-6वीं अनुसूची: स्वायत्तता का किला

​आयोग का सबसे प्राथमिक कार्य 5वीं और 6वीं अनुसूची की सुरक्षा और देखभाल करना है। ये अनुसूचियां हमारे क्षेत्रों की स्वायत्तता का आधार हैं।

  • हमारी पांचवीं अनुसूची का क्षेत्र केवल जमीन का टुकड़ा नहीं है, यह एक ‘स्वायत्तता का किला’ है। आयोग का विशेष दायित्व है कि वह राज्यपालों को इन क्षेत्रों में शांति और सुशासन के लिए सक्रिय करे।
  • ​जब भी कहीं माइंस (खदानों) या बड़े बांधों के नाम पर हमारी जल-जंगल-जमीन छीनने की कोशिश होती है, तो आयोग का हस्तक्षेप ही वह पहली कानूनी बाधा बनती है जो कारपोरेट लूट को रोकती है। आयोग यह सुनिश्चित करता है कि हमारे क्षेत्रों में ग्राम सभाओं की सत्ता ही सर्वोपरि रहे।

3.आयोग के कार्य: जनता किन समस्याओं को लेकर जा सकती है? (सरल गाइडलाइन)

​अक्सर समाज को यह नहीं पता कि किस ‘बीमारी’ का इलाज आयोग करेगा। जनता इन समस्याओं को लेकर सीधे आयोग के पास जा सकती है:

  1. भूमि अधिग्रहण: बिना ग्राम सभा की अनुमति के आदिवासी जमीन हड़पना।
  2. 5वीं-6वीं अनुसूची का उल्लंघन: हमारे संवैधानिक क्षेत्रों में कानून-कायदों की अनदेखी।
  3. अत्याचार निवारण (Atrocity Act): पुलिस द्वारा एफआईआर न लिखना या अपराधियों को बचाना।
  4. योजनाओं में धांधली: नरेगा, आवास या छात्रवृत्ति का पैसा आपके नाम पर कहीं और खर्च होना।
  5. विस्थापन: बिना पुनर्वास के जंगलों या पुश्तैनी गांव से बेदखली।
  6. सांस्कृतिक हमला: हमारी पहचान, देवी-देवताओं या रीति-रिवाजों को गलत तरीके से पेश करना।
  7. अधिकारों का हनन: पंचायत (PESA) अधिकारों का न मिलना या ग्राम सभा को कमजोर करना।

4. आयोग की महाशक्ति: सिविल न्यायालय की शक्तियां

​आयोग के पास सिविल कोर्ट की शक्तियाँ हैं। इसका अर्थ यह है कि:

  • ​आयोग किसी भी अधिकारी को, चाहे वह जिला कलेक्टर हो, पुलिस अधीक्षक (SP) हो या राज्य का मुख्य सचिव, अपने सामने तलब (समन) कर सकता है।
  • ​यदि कोई सरकारी अधिकारी आदिवासी शिकायत पर ध्यान नहीं देता, तो आयोग उन्हें दिल्ली बुलाकर कड़ा जवाब-तलब कर सकता है। यह शक्ति ही हमें नौकरशाही की तानाशाही से बाहर निकालती है और न्याय सुनिश्चित करती है।

5. हमारा गौरवशाली इतिहास और संघर्ष

​हमें यह याद रखना होगा कि हम अपनी पूर्वजों की ‘नालायक औलाद’ नहीं हैं। अनुच्छेद 342-366 हमारे अधिकारों का आधार है। अपनी जड़ों की पहचान के लिए आदिवासी धर्म कोड और PESA Act के महत्व को जानना हर युवा के लिए अनिवार्य है।

6. नेतृत्व और प्रेरणा

​वर्तमान अध्यक्ष श्री अंतर सिंह आर्य (सेंधवा, म.प्र.) आदिवासी नायकों के नेतृत्व में आयोग पूरी तत्परता से काम कर रहा है। आप आयोग के कामकाज को समझने के लिए

अध्यक्ष अंतर सिंह आर्य जी का वीडियो संदेश जरूर देखें।

7. संवैधानिक उपबंध: अनुच्छेद 338-A के 10 महत्वपूर्ण स्तंभ

  1. अनुच्छेद 338-A: आयोग का संवैधानिक गठन।
  2. 338-A (1): स्थापना का वैधानिक प्रावधान।
  3. 338-A (2): संरचना का अधिकार।
  4. 338-A (3): नियुक्ति की प्रक्रिया।
  5. 338-A (4): आयोग द्वारा स्वयं की प्रक्रिया बनाना।
  6. 338-A (5): कर्तव्यों का पालन (अधिकारों की सुरक्षा)।
  7. 338-A (6): राष्ट्रपति को वार्षिक रिपोर्ट सौंपना।
  8. 338-A (7): रिपोर्ट पर कार्यवाही सुनिश्चित करना।
  9. 338-A (8): सिविल न्यायालय की व्यापक शक्तियां।
  10. 338-A (9): जनजातीय नीतिगत मामलों में सरकार को परामर्श देना।

8. संपर्क और शिकायत प्रक्रिया: आयोग तक कैसे पहुंचें?

​जनता को न्याय के लिए भटकने की जरूरत नहीं है। ये रास्ते सबसे सरल हैं:

  • टोल-फ्री नंबर: 1800117777 (इस पर आप अपनी बात रख सकते हैं)।
  • आधिकारिक वेबसाइट: https://ncst.nic.in/ (ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने के लिए)।
  • ईमेल: ncst@nic.in
  • लिखित पता: सचिव, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, 6ठी मंजिल, लोक नायक भवन, खान मार्केट, नई दिल्ली – 110003
  • टेलीफोन: 011-24624714, 011-24635721, 011-24649495

9. जनता के लिए विशेष आह्वान

​”साथियों, आयोग बन जाने भर से न्याय नहीं मिलता। अपनी शिकायत में साक्ष्य (फोटो, दस्तावेज, पुलिस की पुरानी अर्जी) जरूर लगाएं। याद रखें, आप आयोग के पास ‘याचक’ बनकर नहीं, बल्कि ‘अधिकार’ मांगने वाले बनकर जाएं, क्योंकि संविधान आपको यह ताकत देता है।”

10. निष्कर्ष: जागरूकता का उलगुलान

​आदिवासी समाज को अब याचक नहीं बनना है। हमारे पूर्वजों ने उलगुलान किया था, अब हमें संविधान का उपयोग करके अपना ‘न्याय’ छीनना है। जब हम जागरूक होंगे, तभी आयोग जैसे संस्थान और अधिक शक्तिशाली होंगे। आइए, संकल्प लें—अब अन्याय सहेंगे नहीं, बल्कि आयोग का दरवाजा खटखटाकर न्याय लेकर रहेंगे!

जय जोहार! जय आदिवासी!

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