उलगुलान जिन्दाबाद साथियों,
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल शब्द नहीं, बल्कि एक चेतना हैं। उन्हीं में से एक हैं ‘धरती आबा’ (धरती के पिता)—भगवान बिरसा मुंडा। वे एक महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, धार्मिक सुधारक और आदिवासी प्रतीक थे, जिन्होंने अपनी वीरता और रणनीतिक कुशलता से तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिला दी थीं। आज का यह लेख उनके उस महान संघर्ष, बलिदान और आधुनिक गौरव को समर्पित है।
1. धरती आबा का दिव्य अवतरण और प्रारंभिक जीवन
15 नवंबर 1875 को छोटानागपुर के उलिहातू गाँव में जन्मे बिरसा मुंडा का जीवन ही संघर्ष की एक जीवंत गाथा है। उनके पिता सुगना मुंडा और माता करमी हातू ने उन्हें कठिन परिस्थितियों में पाला। मिशनरी स्कूल के दौरान उन्होंने अनुभव किया कि कैसे विदेशी संस्कृति आदिवासी समाज के गौरव को नष्ट कर रही है। उन्होंने अपनी संस्कृति, जल-जंगल-ज़मीन और रूढ़ि प्रथाओं की रक्षा के लिए आजीवन संघर्ष करने का संकल्प लिया।
2. “अबुआ राज एते जाना, महारानी राज टुंडु जाना”: क्रांति का शंखनाद
बिरसा मुंडा का सबसे प्रभावशाली नारा था— “अबुआ राज एते जाना, महारानी राज टुंडु जाना”। मुंडारी भाषा में इस ओजस्वी नारे का अर्थ था— “हमारा राज आएगा, महारानी (ब्रिटिश) का राज जाएगा।” यह नारा महज शब्द नहीं थे, यह आदिवासी स्वायत्तता का उद्घोष था। उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि यह देश हमारा है, और यहाँ का शासन भी हमारा ही होना चाहिए। यह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सीधे तौर पर एक खुली चुनौती थी।
3. उलगुलान: शोषण के विरुद्ध एक महासंग्राम
बिरसा मुंडा का ‘उलगुलान’ (महान विद्रोह) आदिवासी इतिहास की सबसे बड़ी घटना है। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा लागू की गई जमींदारी प्रथा और सूदखोर महाजनों (दिकू) के खिलाफ जंग का ऐलान किया। उनका उद्देश्य केवल विदेशी शासन को हटाना ही नहीं था, बल्कि आदिवासियों की अस्मिता और उनकी पारंपरिक ग्राम सभाओं को पुनः स्थापित करना था।
4. गोरिल्ला युद्ध: अंग्रेजों के लिए अजेय योद्धा
बिरसा मुंडा की सैन्य रणनीति अद्भुत थी। उनके पास अंग्रेजों जैसे आधुनिक हथियार नहीं थे, लेकिन उनके पास था ‘जंगल का ज्ञान’ और ‘गोरिल्ला युद्ध पद्धति’। उन्होंने घने जंगलों का लाभ उठाते हुए ब्रिटिश सेना को बार-बार चकमा दिया। उन्होंने दिखा दिया था कि साहस और रणनीति के आगे बड़ी से बड़ी सैन्य ताकत भी नतमस्तक हो सकती है।
5. CNT/SPT एक्ट: बलिदान का स्वर्णिम फल
बिरसा मुंडा के बलिदान ने अंग्रेजी हुकूमत को सोचने पर मजबूर कर दिया कि आदिवासियों के बिना भारत पर शासन करना कठिन है। उनके बलिदान का ही फल था कि सरकार को छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT Act) लागू करने पड़े। ये कानून आज भी आदिवासियों की जमीन की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा कानूनी कवच हैं।
6. भारतीय संसद का सम्मान: केंद्रीय कक्ष में गौरव गाथा
भगवान बिरसा मुंडा का सम्मान आज पूरे राष्ट्र में है। यह उनके महान बलिदान का ही परिणाम है कि वे एकमात्र ऐसे आदिवासी क्रांतिकारी हैं, जिनकी तस्वीर भारतीय संसद के केंद्रीय कक्ष की शोभा बढ़ा रही है। यह सम्मान न केवल बिरसा मुंडा का है, बल्कि उन करोड़ों आदिवासियों का है जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
7. जनजातीय गौरव दिवस और सरकारी सम्मान
15 नवंबर को अब पूरा भारत ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाता है। यह दिन उनकी जयंती का उत्सव तो है ही, साथ ही हमारे सामाजिक संगठनों के लिए उनके विचारों को घर-घर पहुँचाने का एक माध्यम भी है।
8. भगवान बिरसा मुंडा का आधुनिक गौरव: स्मारक और फिल्में
भगवान बिरसा मुंडा का नाम आज हर भारतीय की जुबान पर है:
- बिरसा मुंडा अंतर्राष्ट्रीय विमानक्षेत्र: राँची में स्थित यह हवाई अड्डा उनके प्रति राष्ट्र का सर्वोच्च सम्मान है।
- बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार: राँची की वह जेल जहाँ उन्होंने अपने प्राण त्यागे, उसे अब स्मारक के रूप में विकसित किया गया है।
- सिनेमा: उनकी वीरता को पर्दे पर उतारने के लिए उन पर कई फिल्में बनाई गई हैं और नई फिल्में भी आने वाली हैं, जो नई पीढ़ी को ‘धरती आबा’ के संघर्ष से रूबरू कराएंगी।
महत्वपूर्ण 10 बिंदु: बिरसा मुंडा का संघर्ष और आज की सच्चाई
बिरसा मुंडा ने जिस ‘उलगुलान’ का बिगुल फूँका था, वह आज भी प्रासंगिक है। हमारे महापुरुषों का बलिदान हमें याद दिलाता है कि कानून तो बने हैं, लेकिन उन पर अमल की लड़ाई अभी भी बाकी है:
- जमींदारी प्रथा का अंत: बिरसा ने अंग्रेजों द्वारा थोपी गई दमनकारी जमींदारी व्यवस्था के खिलाफ सीधी जंग छेड़ी थी।
- दिकू (सूदखोर) से मुक्ति: महाजनों द्वारा कर्ज के जाल में फंसाकर जमीन छीनने की साजिश को उन्होंने विफल किया।
- पारंपरिक ग्राम सभा: बिरसा का सपना था कि गांव का शासन गांव के हाथ में हो, न कि बाहरी प्रशासकों के।
- जल, जंगल, जमीन: उन्होंने स्पष्ट किया कि इन संसाधनों पर पहला हक यहाँ के आदिवासियों का है, न कि कंपनियों या सरकार का।
- CNT/SPT एक्ट का निर्माण: उनके संघर्ष के दबाव में ही अंग्रेजी हुकूमत को ये कानून बनाने पड़े ताकि आदिवासी जमीन बिकने से बच सके।
- PESA एक्ट की शक्ति: आज ग्राम सभाओं को जो कानूनी ताकत मिली है, वह बिरसा के स्वशासन के सपने का ही विस्तार है।
- वन अधिकार कानून: वन पर रहने वाले आदिवासियों के हक को सुनिश्चित करने के लिए यह एक बड़ी कानूनी जीत है।
- आरक्षण का अधिकार: शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण हमारे प्रतिनिधित्व को सुरक्षित करने का एक संवैधानिक औजार है।
- आदिवासी अस्मिता: बिरसा ने केवल जमीन नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और रूढ़ि प्रथाओं को बचाने की अलख जगाई।
- कानून बनाम हकीकत: आज इतने सारे कानून होने के बावजूद ‘जल-जंगल-जमीन’ सुरक्षित क्यों नहीं है? यह सबसे बड़ा सवाल है।
क्या कानून होने के बाद भी हमारी जल-जंगल-जमीन सुरक्षित है?
यह एक गहरा और कड़वा सच है। बिरसा मुंडा ने जिस ‘अबुआ राज’ का सपना देखा था, वह आज भी संघर्ष की मांग कर रहा है।
- सरकारी हस्तक्षेप: आज भी विकास के नाम पर ‘ग्राम सभा’ की सहमति के बिना जल-जंगल-जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है।
- कानून का कमजोर क्रियान्वयन: सीएनटी-एसपीटी एक्ट और पेसा कानून कागजों में तो मजबूत हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका उल्लंघन जारी है।
- हमारी जिम्मेदारी: भगवान बिरसा मुंडा ने हमें हथियार उठाने की हिम्मत दी थी, लेकिन आज हमें ‘कानूनी और संवैधानिक हथियार’ उठाने की जरूरत है। हमें अपने अधिकारों के प्रति शिक्षित होना होगा, ताकि हम दिकू (बाहरी शोषणकर्ताओं) को ग्राम सभा के माध्यम से जवाब दे सकें।
निष्कर्ष: कानून तभी सुरक्षित रहेंगे जब हम ‘ग्राम सभा’ को इतना शक्तिशाली बनाएंगे कि कोई भी बाहरी शक्ति हमारी जमीन पर अवैध कब्जा न कर सके। उलगुलान अभी खत्म नहीं हुआ है, उलगुलान का स्वरूप बदल गया है!
अधिकारों की लड़ाई जारी रखें (Internal Links):
हमारे अधिकारों के लिए और गहराई से समझने के लिए इन्हें ज़रूर पढ़ें:
- PESA एक्ट और भूरिया समिति का महत्व: यहाँ पढ़ें
- 5 जनवरी 2011 का ऐतिहासिक जजमेंट: यहाँ क्लिक करें
उलगुलान जोहार जिन्दाबाद,