“CNT-SPT एक्ट: आदिवासियों के लिए भगवान बिरसा मुंडा का वो कानूनी वरदान, जो जमीन छीनने नहीं देता।”

आदिवासी समाज में एक बात पत्थर की लकीर जैसी है— “हमारी जमीन, हमारी मां है।” लेकिन, क्या आप जानते हैं कि आज जो तुम्हारे पास जमीन का टुकड़ा या हिस्सा है, वह किसी सरकार की खैरात या देन नहीं है? यह तुम्हारे पूर्वजों का संघर्ष है, उनका खून-पसीना है और भगवान बिरसा मुंडा का वह महान आशीर्वाद है जिसने आज भी तुम्हारी जमीन को सुरक्षित रखा है।
​जमींदारों और साहूकारों का वह काला दौर: एक दर्दनाक इतिहास
​इतिहास के उन पन्नों को पलटिए जब बाहरी जमींदारों और साहूकारों ने छल-कपट, झूठे दस्तावेजों और सूदखोरी के जरिए भोले-भाले आदिवासियों की पैतृक जमीनें हड़पनी शुरू कर दी थीं। वे आदिवासियों को कर्ज के दलदल में फंसाते थे और फिर ब्याज की वसूली में उनकी पीढ़ियों पुरानी जमीनें छीन लेते थे।
​आदिवासी अपनी ही जमीन पर मजदूर बन गए थे। तब धरती आबा बिरसा मुंडा ने शंखनाद किया— “अबुआ दिशुम, अबुआ राज” (हमारा देश, हमारा राज)। उस उलगुलान की आग ने अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।
​(आज भी इन लोगों की दलाली, बेनामी खरीद-फरोख्त और साजिशों से आदिवासी समाज और उनकी जमीनें शोषित हैं। इतने कड़े कानूनों के बावजूद, दिकू आज भी नए-नए हथकंडों से आदिवासी जमीन हड़पने की ताक में बैठे हैं।)
​जमीन संरक्षण का सुरक्षा कवच: CNT और SPT एक्ट
​बिरसा मुंडा के उस प्रचंड संघर्ष का ही नतीजा था कि सरकार को छोटा नागपुर काश्तकारी (CNT) एक्ट 1908 और संथाल परगना काश्तकारी (SPT) एक्ट 1949 लाने पड़े।
​CNT एक्ट (1908): यह कानून आदिवासियों के ‘खुंटकट्टी’ अधिकारों की रक्षा करता है। यह बाहरी व्यक्तियों को आदिवासी जमीन खरीदने से पूरी तरह प्रतिबंधित करता है। यह एक्ट आपकी जमीन को किसी भी दिकू के हाथ में जाने से रोकने वाली सबसे बड़ी कानूनी ढाल है।
​SPT एक्ट (1949): यह संथाल परगना के आदिवासियों की पारंपरिक मांझी-परगना व्यवस्था के साथ मिलकर जमीन की रखवाली करता है। यह कानून सुनिश्चित करता है कि संथालों की जमीन केवल संथालों के बीच ही रहे और बाहरी लोगों का हस्तक्षेप शून्य हो।
​हमारे अन्य कानूनी अधिकार (जमीन की सुरक्षा के लिए)
​रूढ़ि प्रथा और पारंपरिक ग्राम सभा (धारा 13, 3): हमारी परंपराएं ही हमारा कानून हैं, जिन्हें कोई कोर्ट नहीं बदल सकता।
​पांचवीं और छठी अनुसूची (अनुच्छेद 244): आदिवासी क्षेत्रों के विशेष प्रशासन की गारंटी।
​PESA कानून: जल, जंगल और जमीन पर ग्राम सभा को मालिक बनाता है।
​फॉरेस्ट एक्ट (वन अधिकार कानून): जंगल और संसाधन पर आदिवासियों का कानूनी हक।
​अनुच्छेद 243-M: आदिवासी क्षेत्रों को सामान्य पंचायती राज व्यवस्था से अलग रखता है और पारंपरिक ग्राम सभा को सर्वोच्च मानता है।
​अनुच्छेद 46: राज्य को निर्देश कि वह आदिवासियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की रक्षा करे।
​अनुच्छेद 19 (5): सरकार को शक्ति देता है कि वह बाहरी लोगों के बसने पर प्रतिबंध लगा सके।
​हमारे चैनल के बारे में
​चैनल का नाम: [adivasilaw.in ]
हमारा लक्ष्य है कि हर आदिवासी भाई-बहन अपने संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक हो। हम कोई साधारण जानकारी नहीं देते, हम वह सच बताते हैं जो आपके अस्तित्व और जमीन की सुरक्षा के लिए जरूरी है। अपने अधिकारों को जानें, अपनी जमीन बचाएं!
​कानूनी लड़ाई और अपडेट्स के लिए नीचे दिए गए व्हाट्सएप बटन को दबाएं:
👇👇👇