ADIVASI LAW

रूढ़ि प्रथा, पारंपरिक ग्राम सभा 13,3(क)

ADIVASI LAW

रूढ़ि प्रथा, पारंपरिक ग्राम सभा 13,3(क)

"सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले"

समता जजमेंट (1997): अनुसूचित क्षेत्रों में केंद्र और राज्य सरकार के पास 1 इंच भी ज़मीन नहीं है — सुप्रीम कोर्ट का पूर्ण विश्लेषण

जोहार साथियों!

आज से हम Adivasi Law पर एक ‘आदिवासी ऐतिहासिक विशेष सीरीज’ शुरू कर रहे हैं। इस सीरीज का उद्देश्य हमारे समाज को उन कानूनों और फैसलों से अवगत कराना है जो हमारी जड़ों को मजबूती देते हैं। आज का विषय है—समता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1997), जिसे दुनिया ‘समता जजमेंट’ के नाम से जानती है।

1. समता जजमेंट क्या है? (पृष्ठभूमि)

​यह मामला आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले का था, जहाँ सरकार ने आदिवासियों की ज़मीन निजी खनन कंपनियों (Mining Companies) को पट्टे पर दे दी थी। ‘समता’ नामक संस्था ने इसके खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। अंततः 11 जुलाई 1997 को सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच (Justice K. Ramaswamy, Justice S. Saghir Ahmad, और Justice G.B. Pattanaik) ने आदिवासियों के पक्ष में फैसला सुनाया।

2. फैसले की मुख्य बातें: जो हर आदिवासी को जाननी चाहिए

​इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने जो टिप्पणियां कीं, वे आज भी ऐतिहासिक हैं:

  • सरकार ज़मीन की मालिक नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान की पाँचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) के तहत आने वाले अनुसूचित क्षेत्रों में सरकार सिर्फ एक ‘ट्रस्टी’ (संरक्षक) है। सरकार के पास इन क्षेत्रों में एक इंच भी मालिकाना हक वाली ज़मीन नहीं है।
  • निजी कंपनियों पर पूर्ण प्रतिबंध: कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार अपनी शक्ति का उपयोग करके आदिवासी ज़मीन किसी भी ‘गैर-आदिवासी’ या ‘निजी कंपनी’ को ट्रांसफर नहीं कर सकती। चाहे वह पट्टा (Lease) हो या बिक्री, सब अवैध है।
  • ग्राम सभा की सर्वोच्चता: यह फैसला साफ करता है कि ज़मीन के उपयोग का अंतिम निर्णय वहां की ‘ग्राम सभा’ ही ले सकती है।

3. अनुच्छेद 243-M और PESA के साथ तालमेल

​ यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को अनुच्छेद 243-M की सुरक्षा के साथ जोड़कर देखा।

  • अनुच्छेद 243-M ने सामान्य पंचायत व्यवस्था को अनुसूचित क्षेत्रों में आने से रोका।
  • ​इसके कारण PESA कानून (1996) बना, जो ग्राम सभा को प्राकृतिक संसाधनों (जल, जंगल, ज़मीन) का पूर्ण नियंत्रण देता है।
  • ​समता जजमेंट ने इसी संवैधानिक ढाल को और मजबूत कर दिया कि ‘पारंपरिक ग्राम सभा’ की अनुमति के बिना सरकार का कोई भी आदेश वहां लागू नहीं होगा।

4. इस फैसले का आदिवासियों के लिए महत्व

​आज के समय में जब विकास के नाम पर आदिवासियों को उनकी ज़मीन से बेदखल किया जाता है, तब यह जजमेंट सबसे बड़ा हथियार है। यह साबित करता है कि:

  1. ​आदिवासियों की ज़मीन ‘अहस्तांतरणीय’ (Non-transferable) है।
  2. ​सरकार को किसी भी प्रोजेक्ट के लिए ग्राम सभा से ‘सहमति’ नहीं, बल्कि ‘अनुमति’ लेनी होगी।
  3. ​खनन से होने वाली आय का एक हिस्सा आदिवासियों के विकास पर ही खर्च होना चाहिए।

✅ सुप्रीम कोर्ट का आधिकारिक सत्यापन लिंक

​हमने इस जानकारी को पूरी तरह कानूनी आधार पर तैयार किया है। आप स्वयं सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर जाकर इस ऐतिहासिक फैसले की पुष्टि कर सकते हैं।​हमने इस जानकारी को पूरी तरह कानूनी आधार पर तैयार किया है। आप स्वयं सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर जाकर इस ऐतिहासिक फैसले की पुष्टि कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट वेरिफिकेशन (Blue Link):

👉 Samatha vs State of Andhra Pradesh (1997) – Official Supreme Court Judgment

निष्कर्ष

​साथियों, जानकारी ही शक्ति है। जब तक हमें हमारे अधिकारों का पता नहीं होगा, लोग हमें गुमराह करते रहेंगे। याद रखिये, आपकी ज़मीन पर आपका पूर्वजों से चला आ रहा ‘रूढ़िगत कानून’ (Customary Law) चलता है, और समता जजमेंट उस कानून पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर है।

जय जोहार! जय संविधान!

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जोहार! मैं आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों, रूढ़ि प्रथा और पारंपरिक ग्राम सभा की रक्षा के लिए समर्पित हूँ। adivasilaw.in के माध्यम से मेरा लक्ष्य हर गांव तक अनुच्छेद 13,3(क), 244(1) और PESA एक्ट की सही जानकारी पहुँचाना है ताकि हमारी ग्राम सभा सशक्त और स्वायत्त बनी रहे।"